Women’s Reservation Bill: राजस्थान में आधी आबादी का हक या परिवारों का दबदबा? महिला आरक्षण के बीच बहस तेज
Women’s Reservation Bill in India: राजस्थान में महिला आरक्षण को लेकर सवाल उठ रहा है कि क्या इसका फायदा आम महिलाओं तक पहुंचेगा या फिर राजनीतिक परिवारों से जुड़ी महिलाओं का ही दबदबा बना रहेगा.

देश में महिला आरक्षण को लेकर सियासत तेज है और इसे महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. लेकिन इसके साथ ही एक बहस भी जोर पकड़ रही है कि क्या यह आरक्षण वास्तव में आम महिलाओं को मौका देगा या फिर राजनीति में पहले से मजबूत पकड़ रखने वाले परिवारों की महिलाओं को ही ज्यादा फायदा मिलेगा?
बीते कुछ वर्षों में देखा गया है कि संसद में पहुंचने वाली कई महिला सांसदों का संबंध किसी न किसी मजबूत राजनीतिक परिवार से रहा है. इससे यह धारणा बन रही है कि राजनीति में महिलाओं की एंट्री अभी भी आम महिलाओं के लिए आसान नहीं है.
अगर टिकट वितरण में पारदर्शिता नहीं आई, तो महिला आरक्षण का फायदा भी उन्हीं परिवारों को ज्यादा मिलेगा जो पहले से राजनीति में मजबूत हैं.
राजस्थान में भी दिखता है यह ट्रेंड
अगर राजस्थान की बात करें, तो यहां भी वंशवादी राजनीति के कई उदाहरण सामने आते हैं. जयपुर लोकसभा सीट से सांसद मंजू शर्मा का राजनीतिक कनेक्शन उनके परिवार से जुड़ा है. उनके पिता भंवर लाल शर्मा जयपुर के हवामहल विधानसभा क्षेत्र से 1977 से 1998 तक विधायक रहे. ऐसे में उन्हें राजनीतिक माहौल पहले से ही मिला हुआ था.
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वहीं राजसमंद से सांसद महिमा कुमारी मेवाड़ भी एक बड़े राजनीतिक और राजघराने से जुड़ी हैं. उनके पति विश्वराज सिंह मेवाड़ भाजपा से जुड़े हैं. वहीं उनके ससुर महेंद्र सिंह मेवाड़ पूर्व सांसद रह चुके हैं. वह 1989–1991 तक अपनी कुर्सी संभाली. साथ ही उनके नाना-ससुर मनाबेंद्र शाह भी टिहरी गढ़वाल से 8 बार सांसद रहे हैं.
इन उदाहरणों से साफ है कि राजनीतिक पृष्ठभूमि आज भी चुनाव जीतने में बड़ी भूमिका निभाती है.
क्या आम महिलाओं को मिलेगा मौका?
महिला आरक्षण का असली मकसद यह है कि समाज के हर वर्ग की महिलाएं राजनीति में आएं और अपनी आवाज उठा सकें. लेकिन अगर टिकट वितरण में वंशवाद हावी रहा, तो यह मकसद अधूरा रह सकता है. जरूरत इस बात की है कि पार्टियां जमीनी स्तर पर काम करने वाली महिलाओं को भी मौका दें, ताकि संसद में विविधता और वास्तविक प्रतिनिधित्व बढ़ सके.
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महिला आरक्षण एक बड़ा और जरूरी कदम है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राजनीतिक दल इसे किस तरह लागू करते हैं. अगर वंशवाद पर रोक नहीं लगी, तो आधी आबादी की पूरी भागीदारी का सपना अभी दूर ही नजर आता है.
Source: IOCL


























