राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच ने पुलिस और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा आदेश पारित किया है. अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी आरोपी को केवल व्हाट्सएप (WhatsApp) के जरिए नोटिस भेजकर गिरफ्तार करना पूरी तरह से अवैध है. इस मामले में हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) और वर्तमान में सिरोही के पुलिस अधीक्षक (SP) पुष्पेंद्र सिंह राठौड़ को अदालत की अवमानना का दोषी माना है. जस्टिस प्रवीर भटनागर की बेंच ने उन्हें आगामी 6 अप्रैल को सजा के बिंदु पर होने वाली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने के सख्त निर्देश दिए हैं.
'व्हाट्सएप नोटिस कानूनी रूप से पर्याप्त नहीं'
रवि मीणा द्वारा दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 41-A के अनुपालन पर जोर दिया. कोर्ट ने कहा कि केवल व्हाट्सएप पर नोटिस भेजकर आरोपी को गिरफ्तार करना न केवल कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन है, बल्कि यह व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का भी सीधा हनन है.
तय प्रक्रिया का हो पालन
अदालत ने जांच एजेंसियों को नसीहत दी कि नोटिस की तामील के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया— जैसे व्यक्तिगत रूप से नोटिस देना, चस्पा करना (नोटिस चिपकाना) या स्पीड पोस्ट— का पालन करना अनिवार्य है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि आरोपी नोटिस का जवाब दे रहा है, तो बिना किसी ठोस कारण के उसे जल्दबाजी में गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए.
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता मोहित खंडेलवाल के अनुसार, यह मामला राजस्थान कौशल एवं आजीविका विकास निगम (RSLDC) में हुए कथित घूसकांड से जुड़ा है. ACB ने 25 जनवरी 2023 को आरोपी को व्हाट्सएप के माध्यम से धारा 41-A का नोटिस भेजकर 31 जनवरी को पेश होने के लिए कहा था. याचिकाकर्ता ने अपनी पत्नी की बीमारी का हवाला देते हुए मोहलत मांगी थी. इसके बावजूद, ACB ने कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए 1 फरवरी 2023 को उसे सीधे गिरफ्तार कर लिया.
'दबाव बनाने की कोशिश'
सुनवाई के दौरान ACB ने अपना बचाव करते हुए कहा कि आरोपी ने टालमटोल का रवैया अपनाया था. जांच एजेंसी ने यह भी दलील दी कि याचिकाकर्ता FIR रद्द करवाने के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जा चुका है, जहां उसे कोई राहत नहीं मिली. ACB के अनुसार, यह अवमानना याचिका केवल जांच एजेंसी पर दबाव बनाने के लिए दायर की गई है.
नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए अहम आदेश
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने ACB की इस गिरफ्तारी को गलत ठहराया. यह आदेश पुलिस की मनमानी पर रोक लगाने और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के दृष्टिकोण से एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है. अब सभी की निगाहें 6 अप्रैल को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां दोषी अधिकारी की सजा पर अंतिम फैसला सुनाया जाएगा.
