राजस्थान के डूंगरपुर से एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसे देखकर हर किसी की आंखें नम हो गई. डूंगरपुर के खेड़ा सामोर गांव में बेटियों ने बेटों का फर्ज निभाया है. अपने 94 साल के पिता की अर्थी को नम आंखों से कंधा देकर अंतिम विदाई दी है. इस पल को देखकर हर कोई भावुक नजर आया.
डूंगरपुर के खेड़ा सामोर गांव की पांच बेटियों ने यह साबित कर दिया कि वे बेटों से कम नहीं हैं. जब समाज की रूढ़ियों को पीछे छोड़कर इन बेटियों ने अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया, तो हर आंख नम हो गई और पूरा गांव इस साहसिक कदम का गवाह बना.
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गांव में शोक की लहर
डूंगरपुर जिले के खेड़ा सामोर गांव में शोक की लहर है. 94 वर्षीय मणिलाल सेवक रतन सेवक का निधन हो गया है. मणिलाल सेवक का पूरा जीवन संघर्ष और समाज सेवा को समर्पित रहा. उन्होंने समाज सुधारक के रूप में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई थी, यही कारण है कि उनके निधन से न केवल परिवार, बल्कि पूरे समाज ने एक मार्गदर्शक खो दिया है.
मणिलाल का जीवन चुनौतियों से भरा रहा. उन्होंने अपनी पांच बेटियों और एक बेटे का पालन-पोषण कर उन्हें काबिल बनाया. लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था. उनके इकलौते पुत्र का विवाह के महज छह माह बाद, 24 वर्ष की अल्पायु में असामयिक निधन हो गया था. इस गहरे दुख ने परिवार को झकझोर दिया, लेकिन मणिलाल ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी बेटियों को ही अपनी ताकत बनाया.
पांच बेटियों ने निभाया बेटों का फर्ज
अंतिम विदाई का क्षण बेहद भावुक था. जब मणिलाल की अंतिम यात्रा निकली, तो उनकी पांचों बेटियों ने बेटों का दायित्व निभाते हुए अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया. इस दृश्य ने न केवल वहां मौजूद लोगों को भावुक कर दिया, बल्कि समाज में बेटियों की शक्ति और समानता का एक बहुत बड़ा और मजबूत संदेश भी दिया है.
आज पूरे खेड़ा सामोर गांव में मातम पसरा है, लेकिन ग्रामीण मणिलाल को एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व के रूप में याद कर रहे हैं. ग्रामीणों ने नम आंखों से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति की प्रार्थना की. इकलौते बेटे को खोने के बाद बेटियों ने ही पिता का सहारा बनकर समाज को नई सीख दी है.
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