राजस्थान के पूर्व मंत्री राजेंद्र गुढ़ा सोमवार (15 जून) को झुंझुनूं कलेक्ट्रेट के बाहर अचानक बीमार होकर गिर पड़े. वह इस्लामपुर गांव का नाम बदलने के प्रस्ताव के विरोध में 22 किलोमीटर लंबी पदयात्रा का नेतृत्व कर रहे थे. भीषण गर्मी में कई घंटों तक पैदल चलने के कारण उन्हें लू और थकावट की समस्या हुई. हालांकि, तबीयत बिगड़ने के बावजूद उन्होंने इलाज कराने और अस्पताल जाने से इनकार कर दिया.

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यह विरोध मार्च सोमवार (15 जून) की सुबह इस्लामपुर गांव से शुरू हुआ था. इसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए, जो गांव का नाम बदलकर 'श्रीरामपुर' किए जाने के प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं. कलेक्ट्रेट पहुंचने के बाद तेज गर्मी और उमस के बीच राजेंद्र गुढ़ा अचानक सड़क पर गिर पड़े. उनके समर्थक तुरंत उनकी मदद के लिए आगे आए. लोगों ने तौलियों से हवा की और उनके चेहरे पर पानी के छींटे मारे.

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कड़ी धूप में टेंट की भी अनुमति नहीं

होश में आने के बाद गुढ़ा ने कहा, "प्रशासन ने हमें टेंट लगाने की अनुमति नहीं दी. यहां छाया तक नहीं है. जब मेरे भाई 45 डिग्री तापमान में खड़े हैं, तो मैं आराम से कैसे बैठ सकता हूं?" पदयात्रा के दौरान प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए राजेंद्र गुढ़ा ने गांव की सांप्रदायिक सौहार्द की परंपरा का उल्लेख किया और गांव की पहचान बदलने के प्रयास का विरोध किया.

उन्होंने एक स्थानीय निवासी का हाथ पकड़कर कहा, "हम पीढ़ियों से भाइयों की तरह साथ रह रहे हैं. शेखावाटी के इतिहास में मुसलमानों ने हर युद्ध में राव शेखा का साथ दिया था और सूफी संत शेख बुरहान का समुदाय में सम्मान किया जाता है."

'नाम बदलने से कमजोर होगी सांस्कृतिक पहचान'

गुढ़ा ने आरोप लगाया कि गांव का नाम बदलने से उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान कमजोर होगी. उन्होंने कहा, "अगर आज गांव का नाम बदला गया तो कल शेखावाटी का नाम बदल दिया जाएगा. हम ऐसा नहीं होने देंगे."

यह विवाद तब शुरू हुआ जब सूरजगढ़ के विधायक राजेंद्र भांबू ने कथित तौर पर इस्लामपुर का नाम बदलकर श्रीरामपुर करने की सिफारिश की और प्रस्ताव मुख्यमंत्री कार्यालय को भेज दिया. इसके बाद मुख्यमंत्री कार्यालय ने झुंझुनूं जिला प्रशासन से इस संबंध में रिपोर्ट मांगी. प्रस्ताव की जानकारी सामने आने के बाद ग्रामीणों ने इसका विरोध शुरू कर दिया और अभियान चलाया.

इस्लामपुर के 200 साल पुराने कागज

बाद में ग्रामीणों के एक प्रतिनिधिमंडल ने जिला कलेक्टर अरुण गर्ग को ज्ञापन सौंपा. साथ ही गांव की पहचान और विरासत से जुड़े लगभग 200 वर्ष पुराने दस्तावेज और रिकॉर्ड भी प्रस्तुत किए, जिनमें 1897 के अभिलेख भी शामिल हैं. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि गांव का नाम बदलने के प्रस्ताव का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है और यह क्षेत्र के लंबे सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास की अनदेखी करता है.

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