BMC में उद्धव ठाकरे को बड़ा झटका, पार्षद की सदस्यता रद्द
BMC चुनाव परिणाम के 8 महीने बाद भी 79 विजयी नगरसेवकों पर तलवार लटक रही है. सत्ताधारी बीजेपी सहित सभी दलों के नगरसेवक मुश्किल में नजर आ रहे हैं.

मुंबई महानगर पालिका में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना यूबीटी समेत सभी नगरसेवकों पर तलवार लटक गई है. मुंबई महानगर पालिका चुनाव 15 जनवरी को संपन्न हुए और 16 जनवरी को परिणाम भी आ चुके हैं. BMC के इतिहास में पहली बार ऋतु तावड़े के रूप में बीजेपी को महापौर की कुर्सी मिली.
दरअसल मुंबई महानगरपालिका के 79 नगरसेवकों के निर्वाचन को चुनौती दी गई है. नगरसेवकों के जाति प्रमाणपत्र, गलत जानकारी, आपराधिक मामलों और संपत्ति घोषणाओं को लेकर याचिकाएं की गई है. अब तक 5 नगरसेवकों का निर्वाचन रद्द हो चुके है. उद्धव ठाकरे की शिवसेना यूबीटी के 24, सत्ताधारी बीजेपी के 16, कांग्रेस के 10 मामलों समेत सभी प्रमुख दलों के नगरसेवक कानूनी चुनौती के घेरे में आई है.
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नगरसेवकों की बढ़ीं मुश्किलें
मुंबई महानगरपालिका चुनाव के नतीजे आने के बाद भी विजयी उम्मीदवारों की मुश्किलें कम होती नजर नहीं आ रही हैं. चुनाव में हारने वाले उम्मीदवारों ने विजयी नगरसेवकों के निर्वाचन को विभिन्न कारणों से चुनौती दी है. मुंबई महानगरपालिका द्वारा आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली को दी गई जानकारी के अनुसार, कुल 79 चुनाव याचिकाएं दाखिल की गई हैं.
इस बीच, हाल ही में पूर्व महापौर विशाखा राऊत का नगरसेवक पद रद्द होने के बाद चुनाव याचिकाओं का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है. इससे स्पष्ट होता है कि चुनाव में जीत हासिल करना अंतिम चरण नहीं है, बल्कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज, शपथपत्र में दी गई जानकारी, जाति प्रमाणपत्र तथा उम्मीदवार द्वारा की गई विभिन्न घोषणाओं की कानूनी जांच भी महत्वपूर्ण है.
खास बात यह है कि इन याचिकाओं में किसी एक दल के नगरसेवक ही निशाने पर नहीं हैं, बल्कि मुंबई के प्रमुख सर्वदलीय नगरसेवकों के खिलाफ चुनाव याचिकाएं दाखिल की गई हैं. इससे चुनाव के बाद नगरसेवक के रूप में प्राप्त पद की कानूनी वैधता और सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं.
जाति प्रमाणपत्र से संपत्ति की जानकारी तक आपत्ति
पराजित उम्मीदवारों द्वारा दाखिल याचिकाओं में कई गंभीर मुद्दे उठाए गए हैं. इनमें जाति प्रमाणपत्र की वैधता, उम्मीदवार द्वारा दी गई जानकारी गलत अथवा भ्रामक होने के आरोप, आपराधिक मामलों की जानकारी तथा संपत्ति और आर्थिक मामलों से संबंधित घोषणाओं पर आपत्ति शामिल है.
चुनाव लड़ते समय उम्मीदवारों को शपथपत्र के माध्यम से अपनी व्यक्तिगत, आर्थिक और कानूनी जानकारी सार्वजनिक करनी होती है. इस जानकारी में विसंगति अथवा गलत जानकारी दिए जाने का आरोप होने पर कानूनी प्रक्रिया शुरू हो सकती है. इसलिए चुनाव आवेदन और शपथपत्र में दी गई प्रत्येक जानकारी का महत्व इस पूरे मामले से सामने आया है.
शिवसेना यूबीटी के खिलाफ सर्वाधिक 24 याचिकाएं
महानगरपालिका द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार, पार्टी अनुसार स्थिति देखें तो शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नगरसेवकों के खिलाफ सर्वाधिक 24 याचिकाएं दाखिल हुई हैं. इसके बाद बीजेपी के खिलाफ 16, कांग्रेस के खिलाफ 10 और शिवसेना (शिंदे) के खिलाफ 7 याचिकाएं दाखिल हुई हैं. इसके अलावा एमआईएम के खिलाफ 5, मनसे के खिलाफ 2 और राष्ट्रवादी कांग्रेस के खिलाफ 1 याचिका दाखिल हुई है.
5 नगरसेवकों का निर्वाचन रद्द
कुल 79 याचिकाओं में से अब तक 5 नगरसेवकों के निर्वाचन पर प्रतिकूल निर्णय हुआ है और उनका निर्वाचन रद्द किया गया है. इनमें शिवसेना यूबीटी के 2, एमआईएम के 2 और राष्ट्रवादी कांग्रेस के 1 नगरसेवक शामिल हैं. इससे यह स्पष्ट होता है कि चुनाव जीतना अंतिम मंजिल नहीं है. उम्मीदवार की उम्मीदवारी से लेकर शपथपत्र में दी गई जानकारी और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों की शुद्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.
आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली द्वारा मांगी गई जानकारी से यह आंकड़ा सामने आया है. जनता के प्रतिनिधि के रूप में चुने जाने वाले उम्मीदवारों द्वारा मतदाताओं के सामने प्रस्तुत की गई जानकारी सही और तथ्यात्मक होना आवश्यक है. यदि उसमें किसी प्रकार की गलती, विसंगति या तथ्य छिपाने का आरोप सामने आता है, तो उसका असर चुनाव परिणाम पर भी पड़ सकता है.
आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने क्या बताया?
आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने बताया, "79 चुनाव याचिकाएं, उनमें से 5 नगरसेवकों का निर्वाचन रद्द होना और हाल ही में पूर्व महापौर विशाखा राऊत का पद रद्द होना. इन घटनाओं ने मुंबई महानगरपालिका चुनाव में उम्मीदवारों की उम्मीदवारी और शपथपत्रों की पारदर्शिता के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है.
अब बची हुई याचिकाओं में क्या निर्णय होता है, इस पर राजनीतिक क्षेत्र की नजरें टिकी हैं. यदि इनमें से कुछ और नगरसेवकों के निर्वाचन पर सवाल उठते हैं, तो इसका असर महानगरपालिका में विभिन्न दलों के संख्याबल पर भी पड़ सकता है. चुनाव में मतदाताओं का जनादेश हासिल कर विजयी होने के बावजूद न्यायिक कसौटी का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में मुंबई महानगरपालिका के सर्वदलीय नगरसेवकों के निर्वाचन के सामने कानूनी चुनौती खड़ी हो गई है.
क्यों रद्द हुई विशाखा राऊत की सदस्यता?
जाति प्रमाणपत्र को अमान्य ठहराए जाने के मामले में विशाखा राऊत की सदस्यता रद्द की गई. मेयर ऋतु तावड़े ने आज (7 सितंबर) को सदन में इस संबंध में घोषणा की. इस संबंध में राज्य के नगर विकास विभाग ने शुक्रवार को ही अधिसूचना जारी की थी. इसके बाद महापौर की ओर से आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की गईं.
विशाखा राऊत मुंबई महानगरपालिका की एक अनुभवी नगरसेविका के रूप में जानी जाती हैं. इसलिए उनकी सदस्यता रद्द होना ठाकरे गुट की शिवसेना के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है. पालघर जिला जाति प्रमाणपत्र सत्यापन समिति ने विशाखा राऊत के जाति प्रमाणपत्र को अमान्य ठहराया था. इस फैसले के बाद उनकी नगरसेवक सदस्यता पर भी अयोग्यता की तलवार लटक रही थी.
किशोरी पेडणेकर नाराज हुईं
इस बीच, आज मुंबई महानगरपालिका की सामान्य सभा में सत्ताधारी और विपक्ष के बीच जमकर हंगामा देखने को मिला. महानगरपालिका स्कूलों के लाखों विद्यार्थियों को शैक्षणिक सामग्री वितरित करने में हुई देरी और GeM पोर्टल के माध्यम से की गई खरीद में कथित गड़बड़ी के मुद्दे पर किशोरी पेडणेकर ने सदन में अपनी बात रखी.
उन्होंने कहा कि वह सदन के नेता का सम्मान करती हैं, लेकिन अगर वे उनके प्रति आक्रामक रवैया अपनाएंगे तो यह उचित नहीं है. इस पर मुंबई महानगरपालिका की विपक्ष की नेता किशोरी पेडणेकर ने सदन के नेता की भूमिका पर आपत्ति जताई.
सदन के नेता का पलटवार
बीजेपी नेता और सदन के नेता गणेश खणकर ने पलटवार करते हुए कहा कि हमारे भीतर आज भी नैतिकता बाकी है और आज भी मुंबई देख रही है कि सदन में हंगामा कौन कर रहा है. हमारे घरों में भी बहनें हैं, इसलिए जब कोई दूसरा बोल रहा हो तो उसे सुनने की क्षमता रखनी चाहिए.
इसके बाद महापौर ने सुझाव दिया कि किसी एक मुद्दे पर चार घंटे बर्बाद नहीं किए जाने चाहिए और सभी को बोलने का अवसर मिलना चाहिए. हंगामा होने पर कई महत्वपूर्ण विषय अधूरे रह जाते हैं, इसलिए सदन की कार्यवाही को आगे बढ़ाया जाना चाहिए.
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