शिवसेना (यूबीटी) की पूर्व राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने देश में ईंधन बचत और सरकारी खर्चों में कटौती को लेकर बड़ा सवाल उठाया है. उन्होंने कहा कि जब मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक ईंधन बचाने के नाम पर मितव्ययिता के कदम उठा रहे हैं या कम से कम ऐसा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, तो फिर देश की नौकरशाही और न्यायपालिका पर ऐसे नियम क्यों लागू नहीं होते?
प्रियंका चतुर्वेदी का यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. उन्होंने अपने पोस्ट में कहा कि भारत की नौकरशाही और न्यायपालिका देश का सबसे विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग बन चुकी है. ऐसे में अगर आम जनता से लेकर नेताओं तक को बचत और सादगी का संदेश दिया जा रहा है, तो इन संस्थाओं को भी जवाबदेह बनाया जाना चाहिए.
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न्यायपालिका पर भी साधा निशाना
अपने बयान में प्रियंका ने खास तौर पर न्यायपालिका का जिक्र करते हुए तंज कसा. उन्होंने कहा कि पूरे सम्मान के साथ वह यह सवाल उठा रही हैं कि क्या न्यायपालिका भी ईंधन बचत और खर्चों में कटौती जैसे कदम अपनाएगी. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें जबलपुर हाई कोर्ट के उस जज का उदाहरण न दिया जाए, जिन्होंने एक दिन साइकिल चलाकर दिखावा करने की कोशिश की थी.
प्रियंका चतुर्वेदी के बयान के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. कुछ लोग उनके सवाल को सही बता रहे हैं और कह रहे हैं कि सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल करने वाले हर वर्ग के लिए समान नियम होने चाहिए.
वहीं कुछ लोगों का मानना है कि न्यायपालिका और प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारियां अलग होती हैं, इसलिए उनकी सुविधाओं की तुलना नेताओं से नहीं की जा सकती.
इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में भी बहस शुरू हो गई है. विपक्षी दल इसे सरकारी तंत्र में मौजूद वीआईपी संस्कृति से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि सत्तापक्ष के समर्थक इसे केवल राजनीतिक बयानबाजी बता रहे हैं.
