मालेगांव ब्लास्ट केस 2008 मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट में सुनवाई हुई. कोर्ट ने साफ किया कि सत्र न्यायालय के फैसले को कोई भी चुनौती नहीं दे सकता. मालेगांव विस्फोट केस में एनआईए के की विशेष अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मंगलवार (16 सितंबर) को कहा कि विस्फोट में मारे गए लोगों के परिजनों की गवाही अगर दर्ज की गई है तो उसका विवरण अदालत को उपलब्ध कराया जाए. बीजेपी की पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित सहित सभी आरोपी मामले में बरी हुए थे. अगली सुनवाई बुधवार को होगी.

पीड़ितों के परिजनों ने फैसले को HC में दी चुनौती

मुख्य न्यायमूर्ति चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखड की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई हुई. मालेगांव विस्फोट के सातों आरोपियों को विशेष एनआईए कोर्ट ने बरी किया था. इस फैसले को विस्फोट में मारे गए छह लोगों के परिजनों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है.

पीड़ित परिवार के सदस्यों के वकील ने पीठ को बताया कि प्रथम अपीलकर्ता निसार अहमद, जिनके बेटे की विस्फोट में मौत हो गई थी, मुकदमे में गवाह नहीं थे. वकील ने कहा कि वह बुधवार को ब्योरा पेश करेंगे. इस पर पीठ ने कहा कि अगर अपीलकर्ता का बेटा विस्फोट में मारा गया था तो उन्हें (निसार अहमद) गवाह होना चाहिए था. पीठ ने कहा, ‘‘आपको (अपीलकर्ताओं को) बताना होगा कि वह गवाह थे या नहीं. हमें विवरण दें....’’

29 सितंबर 2008 को हुआ था धमाका

स्पेशल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए छह परिवारों ने मांग की थी कि इसे रद्द किया जाना चाहिए. 29 सितंबर 2008 में मालेगांव में एक मस्जिद के नजदीक मोटरसाइकल में विस्फोट हो गया था. इस हादसे में छह लोगों की जान चली गई थी. इस केस में बीजेपी की नेता साध्वी प्रज्ञा का नाम आया और ये हाई प्रोफाइल मामला बन गया. इस पर खूब राजनीति हुई और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला.