महाराष्ट्र में 28 साल साथ निभाने वाले बैल की इंसानों की तरह तेरहवीं, किसान ने मुंडन कर निभाई परंपरा
Maharashtra News: महाराष्ट्र के पैठन तालुका के किसान मोहन बापूराव के परिवार ने अपने ‘खांड्या’ नाम के बैल के मृत्यु पर पारंपरिक सूतक का पालन किया, जो पिछले 28 सालों से उनके साथ था.

खेती, किसान और बैल हमारे सिस्टम, अर्थव्यवस्था और पूरी जिंदगी की रीढ़ हैं. किसान अपने बच्चों और परिवार से जितना प्यार करता है, उतना ही अपने बैल से भी करता है, जो उसके लिए किसी राजा से कम नहीं होता और खेती के हर काम में उसका साथ देता है. महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर जिले के कल्याण इलाके से ऐसी ही एक भावनात्मक कहानी सामने आई है. जहां पैठन तालुका के किसान मोहन बापूराव के परिवार ने अपने ‘खांड्या’ नाम के बैल के लिए अनोखे तरीके से शुक्रिया अदा किया, जो पिछले 28 सालों से उनके साथ था.
28 सालों तक साथ देने वाले बैल की मृत्यु पर गांव में की तेरहवीं की रस्म
कुछ दिन पहले खांड्या का निधन हो गया था. कई सालों तक परिवार का हिस्सा रहे इस बैल की मौत के बाद किसान ने इंसानों की तरह उसकी दशक्रिया की और गांव वालों और रिश्तेदारों को तेरहवीं की रस्म में आमंत्रित किया. इतना ही नहीं, मालिक ने खांड्या की दाढ़ी-मूंछ भी बनाई. पाचोड़ के कल्याण इलाके में रहने वाले मोहन जी के पास यह बैल 28 सालों से था और हर साल यह ‘बलिराजा’ की तरह उनके हर काम में मदद करता था. चाहे वो खेत में हल चलाना हो या खेती से जुड़ा कोई अन्य कार्य, ‘खांड्या’ हमेशा उनके साथ खड़ा रहता था.
पारंपरिक सूतक का पालन कर सिर भी मुंडवाया
बैल की मृत्यु के बाद मोहन ने पूरे पारंपरिक सूतक (शोक का पारंपरिक समय) का पालन किया. जिसमें उन्होंने अपना सिर का भी मुंडन किया, जो आम लोग अपने किसी करीबी रिश्तेदार के मृत्यु पर करते हैं. बैल के मृत्यु के 10 दिन बाद उसकी आत्मा के लिए पूरे विधि-विधान से दशक्रिया भी कराई गई. जिसमें वैदिक मंत्रोच्चार किया गया.
परिवार वालों का मानना है कि इतने सालों तक साथ देने और सेवा करने वाले बैल खांड्या को वही सम्मान मिलना चाहिए जो, एक इंसान को दिया जाता है. यह घटना हमें संदेश देती है कि इंसान और पशु आज भी ग्रामीण भारत में परंपरा, करुणा और कृतज्ञता की भूमिका निभाते हैं.
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Source: IOCL

























