जम्मू-कश्मीर घाटी की वादियों में एक बार फिर गणपति बप्पा के जयकारे गूंजने को तैयार हैं. 27 अगस्त से शुरू होने वाले इस त्योहार को श्रीनगर, अनंतनाग और कुलगाम में भी पांच दिवसीय गणेशोत्सव के तौर पर मनाने की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं.

लगातार तीसरे साल यह भव्य उत्सव घाटी में धार्मिक और सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक बनेगा. ऑपरेशन सिंदूर के बाद बप्पा का घाटी में आना लोगों के लिए एक बार फिर से अमन और शांति के नई शुरूआत की आशा ले कर आने जैसा है.

पुणे से पहुंचा भक्ति का संदेश

सार्वजनिक गणेशोत्सव की जन्मभूमि पुणे से इस बार भी खास गणेश प्रतिमाओं की प्रतिकृतियां कश्मीर भेजी गई हैं. शनिवार (23 अगस्त) को श्रीमंत भाऊसाहेब रंगारी गणपति मंडल में केसरीवाडा गणपति, अखिल मंडई का शारदा गजानन और रंगारी गणपति की प्रतिमाएं कश्मीरी प्रतिनिधियों को सौंपी गईं. ढोल-ताशों और नारों के बीच मूर्तियों का प्रस्थान उत्सव जैसा माहौल बना रहा.

परंपरा की वापसी और बदलता माहौल

दक्षिण कश्मीर वेसू वेलफेयर कमेटी के अध्यक्ष सनी रैना ने इसे अपने समुदाय के लिए ऐतिहासिक क्षण बताया. उन्होंने कहा कि 90 के दशक में हुए पलायन के बाद अब 35 साल बाद घाटी में बप्पा का स्वागत करना विश्वास की वापसी है.

वहीं आयोजक पुनीत बालन ने कहा कि गणेशोत्सव अब सीमित नहीं है, यह दुनिया के 175 देशों में मनाया जाता है. घाटी में माहौल बदल चुका है, लोग देर रात तक भजन-कीर्तन में शामिल हो रहे हैं.

सात मंडलों की अहम भागीदारी

इस आयोजन में पुणे के सात बड़े मंडलों का योगदान है- भाऊसाहेब रंगारी गणपति, कसाबा गणपति, अखिल मंडई, तांबडी जोगेश्वरी, केसरीवाडा, गुरुजी तालीम और तुलसीबाग.

आयोजकों का मानना है कि इस पहल से घाटी में भक्ति, संगीत और भाईचारे का वातावरण बनेगा. 132 साल पहले लोकमान्य तिलक ने जो परंपरा पुणे से शुरू की थी, वही अब कश्मीर तक पहुंचकर सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बन रही है.