मुंबई: पुलिस की बड़ी चूक, 'गिरफ्तारी का आधार' न बताने पर आरोपी सौतेले पिता को मिली जमानत
Mumbai News In Hindi: बॉम्बे हाई कोर्ट ने रेप-पॉक्सो केस में सौतेले पिता को जमानत दी. कोर्ट ने माना कि उसे 'गिरफ्तारी के आधार' नहीं बताए गए, जो संवैधानिक रूप से अनिवार्य है.

बॉम्बे हाई कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट और रेप के गंभीर आरोपों में गिरफ्तार एक आरोपी सौतेले पिता को नियमित जमानत दे दी है. अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को गिरफ्तारी के आधार (Grounds of Arrest) नहीं बताए गए थे, जो कि संविधान और कानून के तहत अनिवार्य है. इसी कारण अदालत ने आरोपी को जमानत देने का आदेश पारित किया.
यह मामला वडगांव मावल पुलिस स्टेशन में दर्ज वर्ष 2023 के अपराध क्रमांक 719 से जुड़ा है. इस मामले में आरोपी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 376, 354, 504 और पॉक्सो एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है. आरोप है कि पीड़ित बच्चों के साथ पहले उनके जैविक माता-पिता और बाद में उनके सौतेले पिता द्वारा यौन उत्पीड़न किया गया था.
गिरफ्तारी और कानूनी प्रक्रिया का घटनाक्रम
मामले में तीन आरोपी हैं. पहला आरोपी बच्चों का जैविक पिता, दूसरा आरोपी (आवेदक) उनका सौतेला पिता और तीसरी आरोपी उनकी जैविक मां है. आवेदक को 15 दिसंबर 2023 को गिरफ्तार किया गया था. उसकी जमानत याचिका सितंबर 2025 में सत्र न्यायालय ने खारिज कर दी थी, जिसके बाद उसने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया.
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हाई कोर्ट में दलीलें और सरकारी पक्ष की स्वीकारोक्ति
आरोपी की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि उसे गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए थे और वह 15 दिसंबर 2023 से जेल में बंद है. वहीं, सरकारी पक्ष ने अदालत को बताया कि विशेष मामले में 20 जून 2026 को आरोप तय किए जा चुके हैं, लेकिन अभी तक किसी भी गवाह का बयान दर्ज नहीं किया गया है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि जांच अधिकारी के निर्देश पर सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि आरोपी को गिरफ्तारी के समय गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध नहीं कराए गए थे.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी अपराध में गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में और उसकी समझ की भाषा में बताना अनिवार्य है. यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो गिरफ्तारी और उसके बाद की न्यायिक हिरासत अवैध मानी जा सकती है और आरोपी को रिहा किए जाने का अधिकार प्राप्त हो सकता है.
बचाव पक्ष के दावे और दलीलें
आरोपी की ओर से पैरवी कर रहे वकील अली काशिफ खान देशमुख और स्निग्धा खंडेलवाल ने दावा किया कि दोनों पीड़ित लड़कियों द्वारा दिए गए आरोप अस्पष्ट और विरोधाभासी हैं. उनका कहना है कि दोनों लड़कियों के धारा 164 सीआरपीसी (अब बीएनएसएस के तहत समकक्ष प्रावधान) के तहत दर्ज बयान लगभग एक जैसे हैं और उनमें कई विरोधाभास हैं. दोनों के बयानों में जैविक पिता और सौतेले पिता के खिलाफ लगाए गए आरोप शब्दशः एक जैसे हैं. बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि मेडिकल रिपोर्ट भी लड़कियों द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं करती है. इसके अलावा, दोनों पीड़िताओं की उम्र को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं, क्योंकि उनके जन्म प्रमाण पत्र रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं कराए गए हैं.
बचाव पक्ष के अनुसार, गिरफ्तारी की प्रक्रिया भी कानून के अनुरूप नहीं थी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद आरोपी को गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए, जिसके कारण गिरफ्तारी अवैध हो गई. (यह बचाव पक्ष द्वारा अदालत में रखी गई दलील है.)
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सरकारी पक्ष ने स्वयं स्वीकार किया है कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए थे. ऐसे में कानून के अनुसार अदालत के पास आरोपी को जमानत देने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचता. हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड प्रथमदृष्टया पीड़ित पक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों को पूरी तरह नकारते नहीं हैं.
अदालत का निष्कर्ष और जमानत की शर्तें
अदालत ने आरोपी को 50 हजार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के एक या दो स्थानीय जमानतदारों पर रिहा करने का आदेश दिया है. साथ ही उसे पीड़ितों या गवाहों को प्रभावित नहीं करने, हर महीने दूसरे शनिवार को वडगांव मावल पुलिस स्टेशन में हाजिरी लगाने और मुकदमे की सुनवाई के दौरान नियमित रूप से अदालत में उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है.
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