बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक चर्चित यौन शोषण मामले में अहम फैसला सुनाते हुए महिला शिकायतकर्ता की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने पुलिस द्वारा दाखिल की गई बी-समरी रिपोर्ट को रद्द करने और मामले की दोबारा जांच कराने की मांग की थी. हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं बनता.

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मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम ए. अंखाड की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया. अदालत ने साफ कहा कि जब शिकायतकर्ता स्वयं मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती और पुलिस जांच में आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है, तो मजिस्ट्रेट द्वारा बी-समरी रिपोर्ट स्वीकार किया जाना गलत नहीं कहा जा सकता.

क्या है पूरा मामला?

शिकायतकर्ता महिला ने बीकेसी पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर में एक उद्योगपति पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं 354 (छेड़छाड़), 376 (बलात्कार) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत आरोप लगाए थे. महिला का आरोप था कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसका शारीरिक और मानसिक शोषण किया.

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पुलिस जांच के दौरान सामने आया कि जिन तारीखों और स्थानों का जिक्र एफआईआर में किया गया था, उन दिनों आरोपी की वहां मौजूदगी की पुष्टि नहीं हो सकी. होटल ताज लैंड्स एंड, बांद्रा सहित अन्य स्थानों से मिले रिकॉर्ड भी आरोपों की पुष्टि नहीं कर पाए. इसके बाद पुलिस ने मामले में बी-समरी रिपोर्ट दाखिल करते हुए एफआईआर को झूठा और तथ्यहीन बताया.

मजिस्ट्रेट के सामने शिकायतकर्ता ने जताई असमर्थता

मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट में सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने एक हलफनामा दायर कर कहा कि आंध्र प्रदेश में दर्ज एक अन्य आपराधिक मामले में अपनी और अपने माता-पिता की गिरफ्तारी के कारण वह गंभीर मानसिक आघात से गुजर रही है. उन्होंने अदालत से कहा कि वह इस केस को आगे नहीं बढ़ा सकतीं और मामले को बंद किया जाए. इसके बाद 24 अप्रैल 2024 को मजिस्ट्रेट ने पुलिस की बी-समरी रिपोर्ट स्वीकार कर ली.

हाईकोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?

शिकायतकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि वह राजनीतिक साजिश का शिकार हुई हैं. उन्होंने दावा किया कि आरोपी प्रभावशाली व्यक्ति है और उसके राजनीतिक संपर्कों के चलते निष्पक्ष जांच नहीं हुई. याचिका में यह भी मांग की गई थी कि मामले की जांच सीबीआई या विशेष जांच दल (SIT) से कराई जाए.हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया.

कोर्ट की अहम टिप्पणियां

अदालत ने कहा कि:• वयस्क और शिक्षित महिला द्वारा सहमति से बनाए गए संबंधों को बाद में केवल शादी के वादे के आधार पर बलात्कार नहीं कहा जा सकता.• शिकायतकर्ता ने लंबे समय तक आरोपी के साथ संपर्क बनाए रखा और घटना के काफी समय बाद शिकायत दर्ज कराई.• व्हाट्सएप चैट और तस्वीरों से दोनों के बीच सहमति और निकटता का संकेत मिलता है.• स्वयं शिकायतकर्ता द्वारा केस न चलाने की इच्छा जताने के बाद मजिस्ट्रेट का फैसला सही है.

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि शादी का भविष्य का अनिश्चित वादा अपने आप में धोखाधड़ी या सहमति की गलतफहमी नहीं माना जा सकता. इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्रिमिनल रिट पिटीशन को खारिज कर दिया और कहा कि इस मामले में आगे किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है.