शिवसेना (शिंदे गुट) के पूर्व नगरसेवक रमेश म्हात्रे से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान मुंबई हाईकोर्ट ने ठाणे पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई. अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोपी को वीआईपी ट्रीटमेंट दिए जाने का आभास होता है और पुलिस की भूमिका कई सवाल खड़े करती है.
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस से नागरिकों की सुरक्षा की अपेक्षा की जाती है, लेकिन ऐसी स्थिति नहीं होनी चाहिए जहां पुलिस ही आरोपियों को संरक्षण देती नजर आए. अदालत ने रमेश म्हात्रे को रिमांड के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश किए जाने पर भी सवाल उठाए.
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वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर उठाए सवाल
कोर्ट ने कहा कि रिमांड की मांग के लिए आरोपी को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश करने की मांग 'काफी इनोवेटिव' है. अदालत ने पूछा कि क्या संबंधित अधिकारी अपनी अलग कार्यप्रणाली शुरू करना चाहते हैं? साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि इस निर्णय के पीछे कौन अधिकारी थे.
'कमिश्नर को भी कर सकते हैं तलब'
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले की अगली सुनवाई सोमवार को होगी और आवश्यकता पड़ने पर ठाणे पुलिस आयुक्त को भी अदालत में तलब किया जा सकता है.
ये था पूरा मामला
बता दें कि यह मामला 6 जुलाई को कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका (केडीएमसी) के शास्त्रीनगर अस्पताल में हुई मारपीट की घटना से जुड़ा है. आरोप है कि शिवसेना नेता रमेश म्हात्रे और उनके समर्थकों ने अस्पताल में एक नवजात बच्चे के इलाज को लेकर हुए विवाद के बाद महिला डॉक्टर, नर्सों और अन्य कर्मचारियों के साथ मारपीट की थी. घटना का वीडियो सामने आने के बाद डॉक्टरों और मेडिकल संगठनों ने तीव्र विरोध जताया था.
हाईकोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान
मामले में पुलिस ने रमेश म्हात्रे को गिरफ्तार किया था, लेकिन निचली अदालत से उन्हें जमानत मिल गई. इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जमानत पर रोक लगा दी और म्हात्रे को सरेंडर करने का आदेश दिया. हाईकोर्ट ने जमानत दिए जाने की प्रक्रिया और मामले की गंभीरता पर भी सवाल उठाए थे.
रमेश म्हात्रे ने किया सरेंडर
हाईकोर्ट के आदेश के बाद रमेश म्हात्रे ने पुलिस के सामने सरेंडर किया था. अब उनकी पुलिस हिरासत और मामले की जांच को लेकर सुनवाई जारी है, जिसमें अदालत ने ठाणे पुलिस की भूमिका पर भी कड़े सवाल खड़े किए हैं.
