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BMC Elections 2026: पैसा या पावर, महाराष्ट्र की हर पार्टी के लिए इतना जरूरी क्यों है बीएमसी?

BMC Elections 2026: बीएमसी चुनाव को समझने के लिए आपको सबसे पहले तो बीएमसी को ही समझना होगा. जो लोग महाराष्ट्र के नहीं हैं, उनके लिए बीएमसी क्या है और उसमें कितनी ताकत है? यह जानना जरूरी है.

कहने को तो 15 जनवरी को महाराष्ट्र के कुल 29 नगर निगमों के चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे, लेकिन इन 29 नगर निगम के चुनाव से ज्यादा चर्चा सिर्फ एक नगर निगम के चुनाव की है. और वो है बीएमसी यानी कि बृहन्मुंबई नगर निगम या बृह्नंमुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन. और हर बार की तरह इस बार भी बीएमसी का ये चुनाव लोकसभा या राज्य के विधानसभा चुनाव की तरह ही सुर्खियों में है.

वो वजह चाहे करीब 20 साल बाद ठाकरे भाइयों के एक होने की हो या फिर महाराष्ट्र की राजनीति में बदले समीकरणों के बीच हो रहे पहले चुनाव की, इस पर नज़र सबकी हैं. और सबकी का मतलब सबकी, शीर्ष पर बैठे नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक, देश के बड़े-बड़े कारोबारियों से लेकर हर खास और आम तक, क्योंकि वजह सिर्फ चुनाव नहीं बल्कि इस चुनाव में लगा वो दांव है, जिसमें पैसा भी है, पावर भी है और महाराष्ट्र की सियासी शक्ति का संतुलन स्थापित करने की कोशिश भी, जिसमें महाराष्ट्र की हर सियासी पार्टी अपना-अपना दांव खेल रही है. बीएमसी चुनाव को महाराष्ट्र की हर एक पार्टी ने अपनी नाक का सवाल बना लिया है.

बीएमसी चुनाव की महत्ता को समझने के लिए आपको सबसे पहले तो बीएमसी को ही समझना होगा. महाराष्ट्र के लोग बीएमसी चुनाव में लग रहे पैसे और उससे मिलने वाली ताकत को बखूबी समझते होंगे, लेकिन जो लोग महाराष्ट्र के नहीं हैं, उन्हें तो बीएमसी को समझना ही पड़ेगा.

BMC का बजट कितना होता है?

इसको ऐसे समझिए कि बीएमसी चुनाव का जो बजट होता है, वो देश के कई राज्यों जैसे मिजोरम, सिक्किम, नगालैंड, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों के कुल सालाना बजट से भी ज्यादा होता है. बीएमसी ने फरवरी 2025 में जो 2025-26 का सालाना बजट पेश किया था, वो 74,427 करोड़ रुपये का था. ये पैसे कितने होते हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि इस बजट में हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य डेढ़ साल तक अपना काम चला सकते हैं, क्योंकि उसका सालाना बजट करीब 58 हजार करोड़ का ही है.

गोवा जैसे राज्य तो ढाई साल तक अपना खर्च इस पैसे से चला सकते हैं, क्योंकि गोवा का भी बजट करीब 28 हजार करोड़ का ही रहा है. यानी कि 74 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा का बजट जिसका हो, उसे पाने की कोशिश कौन नहीं करेगा. बाकी यही वो नगर निगम भी है, जो हर साल करीब 3 हजार करोड़ से चार हजार करोड़ रुपये की बचत भी करता है और बचा-बचाकर बीएमसी के खाते में करीब 84 हजार करोड़ रुपये का सरप्लस हो गया है. यही वजह है कि चुनाव के दौरान बीएमसी महाराष्ट्र की हर सियासी पार्टी के लिए अखाड़ा बन जाता है.

BMC जीतने वाला मुंबई पर राज करता है?

अब दूसरी बात, बीएमसी में जीत का मतलब सिर्फ ये 74 हजार करोड़ के खर्च की ताकत या 84 हजार करोड़ रुपये के सरप्लस का ही हाथ में आना नहीं होता, बल्कि एक ऐसी पावर भी आती है, जिससे जीतने वाला मुंबई पर राज करता है. और उसे ये ताकत देता है म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन ऐक्ट 1888. ये ऐक्ट कहता है कि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में विकास से जुड़े जो भी काम होंगे, उसकी इजाजत बीएमसी ही देगा.

यानी कि मुंबई में कोई नई इमारत बनानी हो, उसका नक्शा पास करवाना हो या फिर गली-सड़क-नाली-खड़ंजा बनवाना हो, सबके लिए बीएमसी से परमिशन लेनी ही होगी. अब चूंकि मुंबई रियल स्टेट के लिहाज से भारत का सबसे महंगा सेक्टर है, तो उसका कंट्रोल आखिर कौन होगा, जो अपने हाथ में नहीं लेना चाहेगा. और बीएमसी जिसकी होगी, कंट्रोल भी उसी का होगा.

बीएमसी की एक सियासी ताकत भी!

बाकी बीएमसी की एक सियासी ताकत भी है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. बीएमसी का मतलब है बृह्नमुंबई म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन. तो इसमें मुंबई और मुंबई सब अर्बन दोनों ही आते हैं. बीएमसी के विस्तार को अगर विधानसभा के नजरिए से देखें तो इसमें कुल 36 विधानसभाएं आती हैं. अगर लोकसभा के लिहाज से देखें तो लोकसभा की कुल 6 सीटें अकेले बीएमसी के दायरे में आती हैं. अब विधानसभा में बढ़त बीजेपी की अगुवाई वाली महायुती की है तो उसके पास 36 में से 22 सीटें हैं. जबकि लोकसभा में बढ़त मिली थी महाविकास अघाड़ी को तो उसके पास लोकसभा की कुल 4 सीटें हैं.

यानी कि बीएमसी के पास पैसा भी है, पावर भी है और सियासी रसूख भी, तो बीएमसी में जीत का मतलब इन तीन अहम चीजों को हासिल करना भी है. लिहाजा वो बात चाहे महाराष्ट्र की पार्टियों जैसे दोनों शिवसेना, दोनों एनसीपी और मनसे की हो या फिर दोनों राष्ट्रीय पार्टियों यानी कि बीजेपी और कांग्रेस की, हर कोई हर हाल में बीएमसी में ज्यादा से ज्यादा सीटें चाहता है. अब बीएमसी में सीटें कितनी हैं, बीएमसी जीतने का मतलब कितनी सीटें जीतना है, बीएमसी जीतने पर पद कौन सा मिलता है और आखिर अब तक बीएमसी का इतिहास क्या रहा है, चलिए जरा उसको भी समझने की कोशिश करते हैं, जिससे बीएमसी के भविष्य को भी देखा जा सकता है.

BMC में कितनी सीटें?

तो बीएमसी में कुल सीटें होती हैं 227. जो भी पार्टी 114 सीटें जीतती है, उसका अपना मेयर बनता है, जो सारे फैसले करता है. लेकिन ये फैसले अकेले मेयर के नहीं होते हैं. बल्कि फैसला म्यूनिसिपल कमिश्नर करता है जो आईएएस रैंक का एक अधिकारी होता है. थोड़ा और विस्तार से इस बीएमसी को समझते हैं.

प्रशासन के लिहाज से बीएमसी को कुल सात जोन में बांटा गया है. हर जोन में तीन से पांच वार्ड होते हैं. मुंबई में कुल 24 वार्ड हैं. इन्हें अंग्रेजी के अल्फाबेट्स ए से टी तक में बांटा गया है. इनमें एफ, जी, एच, के, एम और पी में दो-दो वार्ड हैं. कहीं नॉर्थ-साउथ तो कहीं ईस्ट वेस्ट. आर में तीन वॉर्ड हैं. और क्यू कोई वॉर्ड नहीं है. हर वार्ड में सिविक इलेक्टोरल वार्ड्स होते हैं. आसान भाषा में आप इन्हें विधानसभा जैसा कुछ कह सकते हैं. इनकी कुल संख्या है 227.

जैसे विधानसभा जीतने वाले को विधायक कहते हैं ठीक वैसे ही सिविक इलेक्टोरल वार्ड्स जीतने वाले को कहते हैं कॉरपोरेटर. जैसे विधायक अपने में से ही एक शख्स को विधायक दल का नेता चुनते हैं और वही मुख्यमंत्री बनता है, ठीक वैसे ही कॉरपोरेटर अपने में से ही एक मेयर चुनते हैं, जो बीएमसी का मुखिया होता है और उसे मुंबई का पहला नागरिक माना जाता है.

सारी लड़ाई BMC मेयर के लिए?

और सारी लड़ाई इसी पहले नागरिक यानी कि मेयर को लेकर है. क्योंकि बाला साहेब वाली शिवसेना ने अपने गठन यानी कि 19 जून 1966 के करीब 29 साल बाद महाराष्ट्र की सत्ता भले ही पाई, लेकिन बीएमसी तो अपने गठन के पांच साल के अंदर ही शिवसेना कब्जा कर चुकी थी. शिवसेना नेता हेमचंद्र गुप्ते पहले ऐसे शिवसैनिक थे, जो साल 1971 में मुंबई के मेयर बने थे. और उसके बाद कुछेक साल छोड़ दें, तो कमोबेश मुंबई का मेयर कोई न कोई शिवसैनिक ही रहा है.

बीएमसी में शिवसेना के जलवे को इस बात से भी समझा जा सकता है कि जब पूरे देश में आपातकाल लगा था और इंदिरा गांधी ही इस देश की सर्वोच्च सत्ता थीं, तब भी 1976 के बीएमसी चुनाव में शिवसैनिक रहे मनोहर जोशी बीएमसी के मेयर बन गए थे. साल 1996 से 2022 तक इस बीएमसी पर शिवसेना का ही कब्जा रहा है चाहे वो बीजेपी को साथ लेकर रहे या बीजेपी के खिलाफ जाकर. लेकिन बीएमसी रही शिवसैनिकों की ही है.

BMC में अब शिवसेना (UBT) और शिवसेना (शिंदे) क्या करेगी?

लेकिन उन शिवसैनिकों की, जो बाला साहेब के शिवसैनिक थे. अब बाला साहेब के शिवसैनिक दो हिस्सों में टूट चुके हैं. यानी कि शिवसेना ही दो हिस्सों में टूट चुकी है. बाला साहेब के कुछ शिवसैनिक महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ हैं तो कुछ शिवसैनिक बाला साहेब के बेटे उद्धव ठाकरे की शिवसेना के साथ हैं. ऐसे में अब जो चुनाव होने वाले हैं, उनमें कौन से शिवसैनिकों की जीत होगी, सारी लड़ाई इसी बात को लेकर है. और इसमें सबसे ज्यादा दिलचस्पी है बीजेपी की, जो शिवसेना के साथ महाराष्ट्र की सत्ता में पहले साझीदार रहने और फिर खुद की सत्ता बनाने के बाद भी बीएमसी में अपना कोई मेयर नहीं बनवा पाई है. एक वक्त था, जब लगा था कि बीजेपी बीएमसी में कब्जा कर लेगी. 2017 में बीजेपी और शिवसेना की जीत में महज तीन सीटों का ही अंतर था. बीजेपी ने 81 सीटें जीती थीं और शिवसेना ने 84. मुख्यमंत्री भी बीजेपी के देवेंद्र फडणवीस थे तो लगता था कि बीजेपी मेयर बना लेगी. लेकिन तब भी शिवसेना ने अपना मेयर बना ही लिया.

लेकिन अब बदली हुई परिस्थियों में शिवसेना टूट चुकी है. शिवसेना का एक धड़ा यानी कि शिंदे गुट बीजेपी के साथ है. वहीं अलग-थलग पड़े उद्धव ठाकरे को सहारा मिला है अपने भाई राज ठाकरे का, क्योंकि दोनों को ही एक दूसरे की जरूरत है. सियासी महत्वाकांक्षा और पारिवारिक उठापटक में शिवसेना छोड़कर मनसे बनाने वाले राज ठाकरे को भी अभी तय यही करना है कि अगर बीएमसी में शिवसेना की जीत हो तो वो जीत शिंदे वाली शिवसेना की न होकर, उद्धव वाली शिवसेना की ही हो, भले उसके लिए राज को कुछ कुर्बानी देनी पड़े, क्योंकि मसला परिवार की विरासत बचाने का है. वहीं बीजेपी का पास मौका है कमजोर हो चुके उद्धव से बीएमसी को छीनने का, जिसके लिए वो न सिर्फ एड़ी-चोटी का जोर लगाएगी, बल्कि अगर उसे कुछ कुर्बानी भी देनी पड़े तो 2017 की तरह वो कुर्बानी भी देगी, लेकिन शिंदे के लिए... किसी और के लिए नहीं.

BMC चुनाव में क्या है राज ठाकरे की भूमिका?

क्योंकि फिलवक्त कमजोर सिर्फ उद्धव ही नहीं हैं बल्कि कमजोर राज ठाकरे भी हैं. शिवसेना के टूटने के बाद उद्धव के सामने दो बड़े चुनाव आए. लोकसभा और विधानसभा. कांग्रेस, शरद पवार की एनसीपी और अपनी शिवसेना को मिलाकर बनाए गए महाविकास अघाड़ी के बैनर तले जब उद्धव चुनाव लड़े थे लोकसभा का, तो उन्होंने 21 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें से 9 सीटों पर उन्हें जीत मिली थी. इनमें भी 6 सीटें ऐसी हैं, जिनका विस्तार क्षेत्र वही है, जो बीएमसी का है. इस हिसाब से उद्धव इस बीएमसी चुनाव में मजबूत दिखते हैं, लेकिन जैसे ही आप विधानसभा चुनाव पर नजर डालिए, उद्धव की कमजोरी सामने आ जाती है.

उद्धव ने विधानसभा का चुनाव भी महाविकास अघाड़ी के ही बैनर तले लड़ा था. 288 सीटों वाली विधानसभा में उद्धव को लड़ने के लिए मिली थीं 95 सीटें, जिनमें से उन्हें महज 20 सीटों पर ही जीत मिली थी. इनमें से 10 सीटें वो हैं, जो बीएमसी के दायरे में आती हैं. अब रही बात राज ठाकरे की, तो राज ठाकरे ने तो 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ा ही नहीं था, क्योंकि उन्हें बीजेपी को सपोर्ट करना था.

राजनीति की राह में इतने धोखे होते हैं कि...

लेकिन विधानसभा में भी जब राज ठाकरे का खाता नहीं खुला तो उन्हें समझ में आया कि एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे, क्योंकि इस चुनाव में इलेक्टोरल डेब्यू करने वाले उनके बेटे अमित ठाकरे भी चुनाव हार गए. और न सिर्फ हारे, बल्कि तीसरे नंबर पर पहुंच गए. इससे पहले भी राज ठाकरे ने जब शिवसेना से अलग होकर बीएमसी में हाथ आजमाया था तो सिर्फ एक बार 2012 में वो 27 सीटों पर पहुंचे थे बाकि 2017 के आखिरी बीएमसी चुनाव में वो दहाई का भी आंकड़ा पार नहीं कर पाए थे और 7 सीटों पर सिमट गए थे.

ऐसे में मौके की नजाकत को समझते हुए दोनों भाइयों ने हाथ मिलाया है ताकि किसी तरह से सबकुछ गंवाने के बाद कम से कम बीएमसी तो हाथ आ जाए. लिहाजा वो धीरे-धीरे चल रहे हैं, संभल-संभल के चल रहे हैं लेकिन राजनीति की राह में इतने धोखे होते हैं कि कब कौन कहां कैसे पलट जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता. क्योंकि इस खेल में और भी खिलाड़ी हैं, जो भले ही जीतने के लिए खेलें, न खेलें, खेल बिगाड़ने के लिए तो वो खेलेंगे ही. खेल किसका बनेगा, किसका बिगड़ेगा ये तय होगा 16 जनवरी 2026 को. क्योंकि 15 जनवरी की वोटिंग के अगले दिन ही नतीजे आएंगे.

अविनाश राय एबीपी लाइव में प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं. अविनाश ने पत्रकारिता में आईआईएमसी से डिप्लोमा किया है और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ग्रैजुएट हैं. अविनाश फिलहाल एबीपी लाइव में ओरिजिनल वीडियो प्रोड्यूसर हैं. राजनीति में अविनाश की रुचि है और इन मुद्दों पर डिजिटल प्लेटफार्म के लिए वीडियो कंटेंट लिखते और प्रोड्यूस करते रहते हैं.

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