'गिरिबाला सिंह ने क्राइम सीन मैनेजमेंट की ट्रेनिंग ली है, ऐसे में...', HC में बहस, फैसला रिजर्व
Twisha Sharma Death Case: ट्विशा शर्मा केस में आरोपी सास गिरिबाला सिंह की जमानत याचिका के खिलाफ सुनवाई हुई. वकील पीयूष तिवारी ने कहा कि जज साहब ने दोनों पक्षों को सुना है. फैसला शायद कल तक आए

गिरीवाला सिंह की जमानत याचिका को खारिज करने को लेकर बुधवार (27 मई) को जबलपुर हाई कोर्ट में सुनवाई हुई. भोपाल में गिरीबाला सिंह के घर के बाहर बड़ी संख्या में पुलिस को तैनात किया गया. लंबी बहस के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया. कोर्ट में दोनों पक्षों की दलील को विस्तार से सुना गया.
पीड़ित पक्ष के वकील ने क्या दलीलें दीं?
जिला अदालत में अग्रिम सुनवाई के दौरान सीसीटीवी फुटेज प्ले किए गए थे, जबकि डीवीआर और अन्य सामग्री पहले ही जब्त कर ली गई थी. इससे यह सवाल खड़ा होता है कि समर्थ के परिवार के पास सीसीटीवी का एक्सेस कैसे था.
स्टेट के साथ-साथ हमारी भी शुरुआत से यही आपत्ति रही है कि आरोपियों के पास तथ्यों और साक्ष्यों तक पहुंच थी और उनके साथ छेड़छाड़ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.
चौकी उनके घर से महज 200 मीटर की दूरी पर थी, फिर भी 12 तारीख की घटना के बाद तत्काल पुलिस को सूचना नहीं दी गई.
मौत की सूचना मिलने के बाद यदि यह मान भी लिया जाए कि मामला आत्महत्या का था, तो तीसरी मंजिल से नीचे आने के बाद करीब 52 से 55 मिनट का समय क्यों बर्बाद किया गया, यह बड़ा सवाल है.
कई घटनाक्रम इस ओर संकेत करते हैं कि शुरुआत से ही साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश की गई.
घर के पास मौजूद अमाउंट हॉस्पिटल से एंबुलेंस न बुलाया जाना भी संदेह पैदा करता है.
जमानत देते समय पुलिस ने ऐसा कौन सा इन्वेस्टिगेशन कोर्ट के सामने रखा, जिससे कोर्ट संतुष्ट हो गई और जांच के आधार पर राहत दे दी.
आरोपी पक्ष से जुड़े लोग क्रिमिनल केस प्रैक्टिस करते हैं और रिटायर्ड जज से भी संबंध रहे हैं, ऐसे में जांच प्रभावित होने की आशंका जताई गई.
गिरिबाला सिंह ने क्राइम सीन एविडेंस और क्राइम सीन मैनेजमेंट की ट्रेनिंग ली है. ऐसे में यह माना जा सकता है कि उन्हें सबूतों की प्रकृति और महत्व की पूरी जानकारी थी. इसी आधार पर साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका जताई जा रही है.
6 महीने के भीतर विवाहिता की मौत हो जाती है और उसके परिजनों को जमानत मिल जाती है. यदि कोर्ट ने गिरिबाला सिंह की उम्र 63 वर्ष होने को आधार माना, तो लगभग हर सास की उम्र इसी के आसपास होती है.
12 मई को रात 10:25 बजे हादसा हुआ, जबकि पुलिस 13 मई की सुबह 9:40 बजे पहुंची. यदि पुलिस सुबह ही पहुंच गई थी, तो FIR दर्ज हुए बिना आखिर क्या-क्या सीज किया गया.
बहस के दौरान डॉ. नरेश कुमार बनाम सरिता अग्रवाल मामले का हवाला दिया गया. आदेश में कहा गया है कि गंभीर अपराधों में जमानत देने से पहले कोर्ट को सभी पहलुओं पर विचार करना चाहिए. यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो जमानत निरस्त की जा सकती है. इसी आधार पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले में जमानत याचिका खारिज की थी.
महाधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि 17 फरवरी को पहली बार पता चला कि मृतका गर्भवती थी, लेकिन इसके बाद भी बच्चे की पैटरनिटी पर सवाल खड़े किए गए.
महाधिवक्ता की ओर से कोर्ट में चैट का भी उल्लेख किया गया.
दलील दी गई कि जब अग्रिम जमानत लगाई गई थी, तब FIR तक दर्ज नहीं हुई थी. यदि केस डायरी का सही तरीके से परीक्षण किया जाता, तो जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता. यह केवल जांच शुरू करने का रास्ता खोलता था.
आरोपियों द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों पर जिला अदालत ने पूरी तरह भरोसा किया और जमानत आदेश में केस की मेरिट पर भी टिप्पणी कर दी, जो सामान्य तौर पर नहीं की जाती.
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गिरिबाला सिंह के वकील की दलील
ट्विश की मौत के बाद 20 मिनट के बाद AIIMS पहुंचाया गया.
अधिकारियों को कोई पूछताछ करनी थी तो गिरिबाला और समर्थ दोनों मौजूद इसलिए सहयोग न करने की बात गलत है.
पोस्टमार्टम के दौरान गिरिबाला के वहां मौजूद होने से इनकार किया.
AIIMS की रिपोर्ट के अनुसार बॉडी को पिता नवनिधि शर्मा ने आइडेंटिफाई किया.
सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता का तर्क
गिरिबाला सिंह को जिन आधार पर जमानत दी गई, उस तर्ज पर 90% लोगों को जमानत मिल जाएगी.
FIR के पहले जमानत देने का क्या मतलब है.
ट्रायल कोर्ट में केस डायरी भी ठीक से नहीं देखी गई.
गिरीबाला सिंह ने कानून की जानकार होने का उठाया फायदा.
उन्हें पता था कि महिला से शाम को पूछताछ नहीं की जा सकती.
इसलिए गिरिबाला सिंह ने शाम को एसएचओ को मेल और व्हाट्सप मैसेज किया.
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