सीहोर में शतायु गोविंद सिंह वर्मा को अनोखी विदाई, पिता की अंतिम इच्छा पर झूमा पूरा गांव
Sehore News: दीवाडिया गांव के वयोवृद्ध निवासी गोविंद सिंह वर्मा 100 वर्ष से अधिक आयु के बाद एक समृद्ध, खुशहाल और संतोषजनक जीवन जीकर पंचतत्व में विलीन हो गए. उनकी अंतिम यात्रा चर्चा का विषय बन गई है.

- 100 वर्षीय गोविंद सिंह वर्मा को दी गई अनोखी अंतिम विदाई.
- बेटों ने पिता की इच्छा पर शोक की जगह उत्सव मनाया.
- ढोल-ताशों और संगीत के साथ निकली पिता की अंतिम यात्रा.
- जीवन-मरण पर सकारात्मक संदेश देती यह विदाई चर्चा में.
मृत्यु जीवन के अंतिम पड़ाव कहा जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के इछावर क्षेत्र के ग्राम दीवाडिया में इसको लेकर एक अलग ही नजारा देखने को मिला. यहां एक परिवार ने 100 वर्षीय बुजुर्ग की मृत्यु को एक सफल जीवन यात्रा के उत्सव में बदल दिया. गांव के वयोवृद्ध निवासी गोविंद सिंह वर्मा 100 वर्ष से अधिक आयु के बाद एक समृद्ध, खुशहाल और संतोषजनक जीवन जीकर पंचतत्व में विलीन हो गए. अब उनकी अंतिम यात्रा चर्चा का विषय बन गई है.
उनके निधन के बाद परिजनों और ग्रामीणों ने पारंपरिक शोक की बजाय उन्हें सम्मान और उल्लास के साथ अंतिम विदाई दी. आमतौर पर शवयात्राएं गम और सिसकियों के बीच निकलती हैं, लेकिन गोविंद सिंह की अंतिम यात्रा में वातावरण वैराग्य और आनंद के अनूठे संगम से सराबोर था. बेटों ने आंखों में आंसू रोकने की कोशिश नहीं की, बल्कि पिता की अंतिम इच्छा का मान रखते हुए ढोल-ताशों और डीजे की धून के साथ उन्हें विदा किया.
पिता का आदेश और बेटों का तर्पण
कहते हैं कि एक भरा-पूरा जीवन जी लेने के बाद मृत्यु भी एक वरदान बन जाती है. गोविंद सिंह वर्मा ने अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर अपने बेटों से एक मार्मिक इच्छा व्यक्त की थी कि जब वो इस संसार से विदा लें, तो माहौल में मातम नहीं, बल्कि खुशियों का संगीत होना चाहिए. पिता की इच्छा का मान रखते हुए दोनों बेटों, बाबूलाल वर्मा और बद्री प्रसाद वर्मा ने समाज की रूढ़ियों को दरकिनार कर अपने पिता को ठीक वैसी ही विदाई दी जैसी उनकी अंतिम इच्छा थी.
विदाई में दिखा जीवन का उल्लास
इस अंतिम यात्रा में एक तरफ ढोल-नगाड़े और संगीत की गूंज थी, वहीं दूसरी तरफ दादाजी के जाने से उनके परिजन और गांव के लोगों की आंखे नम थी. यह दृश्य इस बात का गवाह है कि यदि जीवन को पूरी शिद्दत और नेकी से जिया जाए, तो मौत भी अपना खौफ खो देती है और एक उत्सव में बदल जाती है.
परिजनों ने कहा कि सौ वर्षों की यह जीवन यात्रा केवल एक उम्र का आंकड़ा नहीं, बल्कि उनके त्याग, प्रेम और संस्कारों की एक समृद्ध विरासत है. दादाजी का जाना एक शून्य जरूर छोड़ गया है, लेकिन उनकी विदाई का यह अंदाज सदियों तक याद रखा जाएगा.
अंतिम विदाई बना गांव में चर्चा का विषय
दीवाडिया गांव में बुजुर्ग की यह अंतिम यात्रा समाज को यह संदेश दे गई है. संदेश ये अंतिम विदाई केवल रुदन की मोहताज नहीं होती. जब कोई आत्मा अपनी सांसों का सफर गरिमा के साथ पूरा करती है, तो उसकी विदाई पर देवता भी पुष्प वर्षा करते हैं. गोविंद सिंह वर्मा की यह अंतिम विदाई पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गई है और इसने जीवन-मरण को लेकर एक सकारात्मक संदेश लोगों को दिया है. शतायु पुरुष गोविंद सिंह वर्मा के इस महाप्रस्थान को पूरा जिला नमन कर रहा है.
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