कागज पर देश के सबसे साफ शहर का तमगा लगाने वाला इंदौर इतना गंदा और इतना जहरीला है कि पानी में मिले उस जहर की वजह से अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है. पांच से ज्यादा लोग गंभीर रूप से बीमार हैं और 1400 से ज्यादा लोग अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती हैं.

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अभी तक अपनी सफाई पर इतराते इस शहर में हुई मौतों ने सबको झकझोरकर रख दिया है, जिसने कई सवाल खड़े किए हैं कि इतनी सफाई वाले शहर में जहर आया कैसे, आखिर कैसे पानी की पाइप लाइन और शहर की सीवर लाइन एक हो गई, आखिर इस जहर का जिम्मेदार कौन है और आखिर इस पानी में जहर के नाम पर ऐसा क्या था कि लोगों को इलाज के बाद भी बचाया नहीं जा सका. सभी सवालों का जवाब जानने की कोशिश करेंगे.

इंदौर शहर को पीने का पानी मिलता है नर्मदा नदी से. इंदौर से करीब 70-80 किलोमीटर दूर खरगौन जिले के जालौद गांव के पास नर्मदा नदी से पानी निकाला जाता है और उसे वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में ट्रीट करने के बाद पाइपलाइन के जरिए इंदौर शहर में पहुंचाया जाता है. नर्मदा वाटर प्रोजेक्ट के तहत ऐसी पाइपलाइन का जाल पूरे शहर में बिछा हुआ है, जो अंडरग्राउंड है.

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ऐसी ही एक अंडरग्राउंड पाइप लाइन इंदौर शहर की भागीरथपुरा में भी है, जिससे उस इलाके को पानी मिलता रहा है. भागीरथपुरा में चौगी के पास शौचालय बना है, लेकिन शौचालय बनाने वालों ने सेप्टिक टैंक नहीं बनवाया और उसके पैसे बचा लिए. नतीजा पूरा का पूरा सीवेज वाटर सप्लाई वाली पाइप लाइन के साथ कनेक्ट हो गया, जिससे खरगौन से चला साफ पानी गटर के पानी के साथ मिलकर जहरीला हो गया. यही पानी लोगों के घरों में नलों के जरिए सप्लाई हुआ और फिर उसे पीकर लोग बीमार पड़ गए.

15 लोगों की मौत हो चुकी है. कुछ लोग जिंदगी-मौत से जंग कर रहे हैं और 1500 से ज्यादा लोगों पर इसका गंभीर असर हुआ है. मानवाधिकार आयोग से लेकर हाई कोर्ट तक इस मामले में दखल दे चुका है और अब वक्त जवाबदेही तय करने का है. क्योंकि जो हुआ है, उसे हादसा नहीं बल्कि हत्या कहा जाना चाहिए क्योंकि पीने के पानी में जो मिला है, वो विशुद्ध जहर है. अभी तक की जांच में उस पानी में मिला क्या-क्या है, आपको पहले वो बताते हैं.

पानी में मिला है वीब्रियो कोलेरी, जिससे हैजा होता है. इसके अलावा फीकल, कॉलीफॉर्म, ई कोलाई और क्लेस बेला जैसे बैक्टीरिया भी इस पानी में मिले हैं, जो उल्टी और दस्त के लिए जिम्मेदार हैं.

अब सवाल है कि पानी में मिले इस जहर का जिम्मेदार कौन है. चलिए आपको एक-एक करके उन किरदारों से मिलवाते हैं, जिनकी लापरवाही ने 15 लोगों की जान ले ली और सैकड़ों लोगों को जिंदगी और मौत के बीच उलझाकर रख दिया.

1. दिलीप यादव : दिलीप यादव निगम आयुक्त हैं. साफ पानी की सप्लाई उनके ही जिम्मे है. उनसे गंदे पानी की शिकायत भी की गई, लेकिन उन्होंने शिकायतों को अनदेखा किया.

2. रोहित सिसोनिया : ये इंदौर के अपर आयुक्त हैं. इन्होंने भी किसी की शिकायत नहीं सुनी. उल्टे नई पाइप लाइन के लिए जब अगस्त में टेंडर हुए तो उसे भी रोक दिया.

3. कमल वाघेला : ये पार्षद हैं. पहली जिम्मेदारी इनकी ही बनती है. लेकिन इन्होंने किसी भी शिकायत पर न खुद ध्यान दिया और न ही लोगों की शिकायतों को ऊपर तक पहुंचाया. अब जब 15 लोगों की मौत हो चुकी है तो कह रहे हैं कि इन्होंने 2024 से ही शिकायत करनी शुरू कर दी थी, लेकिन अफसरों ने ध्यान नहीं दिया.

4.  पुष्यमित्र भार्गव : ये मेयर हैं. यानी कि महापौर. कमल वाघेला पर दबाव पड़ने के बाद जब उन्होंने शिकायत की तो पुष्यमित्र भार्गव ने कोई कदम नहीं उठाया.

5.बबलू शर्मा : ये जल कार्यप्रभारी हैं. इंदौर शहर में साफ पानी की सप्लाई की जिम्मेदारी इनकी ही है. इन्हें शिकायतें मिल रही थीं, लेकिन इन्होंने अनदेखी की.

6.संजीव श्रीवास्तव : ये पानी की सप्लाई के प्रभारी हैं. शिकायतें इनको भी मिली थीं. लेकिन कार्रवाई नहीं की. 15 लोग मर गए तो इन्होंने लीकेज खोज लिया है.

7. शुभम श्रीवास्तव : ये जोन 4 के उपयंत्री हैं, जिनके जिम्मे गंदा पानी आने पर ऐक्शन लेना है. भागीरथपुरा जोन 4 में ही आता है. इन्हें शिकायत मिली थी, लेकिन काम नहीं किया.

8. योगेश जोशी : इंदौर में एक हेल्पलाइन है 311. इसपर लोग शिकायतें दर्ज करवाते हैं. इनको सुनने का काम योगेश जोशी का है. 311 पर गंदे पानी की शिकायत मिली, लेकिन इन्होंने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई.

बाकी दो और भी लोग हैं, जो अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते हैं. और इसमें पहला नाम है कैलाश विजयवर्गीय का. कैलाश विजयवर्गीय भागीरथपुरा विधानसभा के विधायक हैं और मोहन यादव सरकार में मंत्री भी. मध्यप्रदेश के शहरी विकास की जिम्मेदारी उन्हीं की है. इंदौर शहर है और इंदौर में विकास की जिम्मेदारी भी कैलाश विजयवर्गीय की ही है. लेकिन जब उनसे सवाल पूछा जाता है तो वो फोकट का सवाल कहते हैं. कुछ ऐसा कहते हैं जो बिल्कुल भी मर्यादित नहीं है और जब बवाल बढ़ता है तो वो सफाई देकर बचने की कोशिश करते हैं. लेकिन इसी बात में वो ये बात भी कहते हैं कि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल नहीं था, जिसकी वजह से ये हादसा हुआ.

और जब तालमेल सही नहीं था तो जिम्मेदारी बनती है उस शख्स की, जिसके जिम्मे पूरा प्रदेश है. यानी कि खुद मुख्यमंत्री मोहन यादव : मोहन यादव पूरे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. हर छोटी-बड़ी घटना की जिम्मेदारी उनकी खुद की है. लिहाजा इन 15 लोगों की मौत की जिम्मेदारी से वो खुद भी बच नहीं सकते हैं. 2-2 लाख रुपये का मुआवजा तो उन्होंने मृतकों के लिए घोषित कर दिया, अस्पतालों में भर्ती लोगों के इलाज का खर्चा भी उठाने की जिम्मेदारी ले ली, लेकिन क्या पैसों से वो 15 लोग वापस आ पाएंगे, जिनकी मौत इस गंदे पानी की वजह से हुई.

क्या 5 महीने को वो अव्यांश कभी फिर से अपनी मां की गोद में खेल पाएगा, जिसके लिए उसकी मां को नौकरी छोड़नी पड़ी, 9 महीने तक बिस्तर पर रहना पड़ा और बीमारी की वजह से जब अव्यांश को बाहर के दूध में पानी मिलाकर पिलाया गया तो उसकी मौत हो गई?

कोई वापस नहीं आएगा. न अव्यांश, न उर्मिला, न नंदपाल, न उमा, न मंजुला और न ही इनके जैसे और भी वो 10 लोग. क्योंकि ये लोग जहर वाला पानी पीकर मर चुके हैं. और जिनके ऊपर ये सब ठीक करने की जिम्मेदारी थी, वो शिकायतें आने के बाद झूला झूल रहे थे, आयोजन में खाना परोस रहे थे और हर वो काम कर रहे थे, जिसका वास्ता शहर में साफ पानी की सप्लाई से दूर-दूर तक नहीं था. अब जांच हो रही है. लीकेज की. सिर्फ पाइपलाइन में ही नहीं सिस्टम में भी हुई लीकेज की.

लेकिन सवाल है कि क्या वो लीकेज पकड़ी जाएगी और अगर पकड़ी भी गई तो क्या वो लीकेज दुरुस्त होगी. पाइपलाइन की लीकेज के लिए तो सिर्फ टेक्निक चाहिए, नई पाइप चाहिए और कुछ कुशल लोग, जो उसे बदल सकें. लेकिन सिस्टम की लीकेज दूर करना असल काम है, जो शायद ही कभी दूर हो पाए, क्योंकि उसके लिए सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए और वो बाजार में खरीदने से नहीं मिलती है.