प्रयागराज महाकुंभ 2025 से मशहूर हुईं हर्षा रिछारिया ने कहा कि धर्म का प्रचार तब करना उचित है जब आपके पास उतना अमाउंट (पैसा) हो. उन्होंने कहा कि जिस राशन वाले के यहां से महीने का सामान आता है, वो उधारी तो देगा लेकिन उसके बाद वो भी बोलेगा कि इतने दिन हो गए, अब तो पैसे दे दो. वो पैसे दूंगी कहां से? उनका बयान ऐसे समय में आया है जब उन्होंने 'धर्म का रास्ता' छोड़ने का फैसला किया है.
बार-बार मेरे चरित्र पर सवाल उठाया गया- रिछारिया
भोपाल में मीडिया से बातचीत में हर्षा रिछारिया ने कहा, "मैं अपने सारे काम छोड़कर इस रास्ते पर आगे बढ़ी थी. अंत में मुझे ये समझ में आया कि मैं कोई साधु, साध्वी या संन्यासी तो हूं नहीं, जो मैं लोगों से दान-दक्षिणा लूंगी और उससे अपने सारे काम करूंगी. मुझे समय में आया कि धर्म का प्रचार करना तब उचित है जब आपके पास उतना अमाउंट भी हो...आप लोग विरोध करें, आप लोग साथ न दें, बार-बार मेरे चरित्र पर ऊंगलियां उठाएं और फिर मैं उधारी में भी दबूं तो इससे बेहतर है कि अपना काम ही थोड़ा-थोड़ा करें जिससे हम अपनी खुद की जिंदगी जी सकें."
'मैं अंत में परेशान हो गई थी'
इसके आगे उन्होंने कहा, "मैं किसी का नाम तो नहीं लूंगी लेकिन कुछ हैं जो लगातार इन चीजों की कोशिशें कर रहे हैं. मेरा मानना है कि अगर मुझे किसी व्यक्ति विशेष से कोई भी परेशानी है तो मैं उसका सहयोग नहीं करूंगी. लेकिन बार-बार उस व्यक्ति के जीवन में परेशानियां उत्पन्न करना, ये ठान लेना कि ये भी कुछ भी करेगा जीवन में तो आगे नहीं बढ़ने देंगे, ये बहुत गलत सोच है. कुछ संत हैं जो लगातार इस चीज की कोशिश कर रहे हैं कि मैं अंत में परेशान हो गई थी."
मेरी कोशिशों को बार-बार रोका जा रहा था- रिछारिया
हर्षा रिछारिया ने कुंभ का जिक्र करते हुए कहा, "ये बोलना गलत होगा कि कुंभ के दौरान मैंने सनातन धर्म को अपनाया. कोई भी व्यक्ति अपना ही नहीं सकता जब तक धर्म आपको न अपनाए. मैं खुद को वो सौभाग्यशाली व्यक्ति मानती हूं जिसका जन्म ही इस धर्म में ही हुआ है तो मैं कौन होता हूं धर्म को अपनाने वाली. महाकुंभ से सनातन का जो प्रचार हमने शुरू किया था, उस पर मैंने विराम लगाने की बात बोली थी. वो इसलिए क्योंकि पिछले एक सालों से जो मैं प्रयत्न कर रही थी, उसको कहीं न कहीं रोक दिया जा रहा था. लगातार विरोध-लगातार विरोध. और ये विरोध कुंभ से शुरू होकर अभी तक थमने का नाम नहीं ले रहा है."