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'प्रेस की स्वतंत्रता निरंकुश...', पूर्व मंत्री भूपेन्द्र सिंह मानहानि केस में दिल्ली HC टिप्पणी

Madhya Pradesh News In Hindi: दिल्ली हाईकोर्ट ने पूर्व मंत्री एवं खुरई विधायक भूपेन्द्र सिंह से संबंधित सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और प्रकाशनों पर सुनवाई के बाद दिए आदेश में गंभीर टिप्पणी की.

दिल्ली हाईकोर्ट ने पूर्व मंत्री एवं खुरई विधायक भूपेन्द्र सिंह से संबंधित सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और प्रकाशनों पर सुनवाई के बाद दिए आदेश में गंभीर टिप्पणी की. अदालत ने कहा है कि संबंधित सामग्री में से कई पोस्ट और वीडियो वादी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने और मामले को सनसनीखेज बनाने का प्रयास करते दिखाई देते हैं.

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रस्तुत सामग्री निष्पक्ष रिपोर्टिंग अथवा तथ्यात्मक आलोचना के बजाय मामले पर समय से पहले निष्कर्ष निकालती हुई प्रतीत होती है. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई तक प्रतिवादियों को भूपेन्द्र सिंह के विरुद्ध इसी प्रकार के या समान मानहानिकारक आरोप वाली पोस्ट प्रकाशित करने से रोकने के साथ सूचीबद्ध आपत्तिजनक पोस्ट और वीडियो हटाने के निर्देश दिए हैं.

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किसी की गरिमा को अपमानित करने  की अनुमति नहीं- हाईकोर्ट

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की आड़ में किसी व्यक्ति की गरिमा और सम्मान को बदनाम या अपमानित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. प्रेस को जनहित से जुड़े विषयों पर रिपोर्टिंग करने की स्वतंत्रता है, लेकिन यह स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है और मीडिया मंचों को किसी व्यक्ति की चरित्र-हत्या से बचना चाहिए.

मानहानिकारक सामग्री प्रसारित करने का लगाया था आरोप

इस प्रकरण में प्रतिवादी ‘सबकी खबर’ न्यूज चैनल के संचालक रवीन्द्र जैन, फेसबुक यूजर अभिषेक जैन सहित अन्य पांच प्रतिवादी शामिल हैं. दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश में प्रतिवादी अभिषेक जैन के फेसबुक प्रोफाइल, ‘सबकी खबर’ यूट्यूब चैनल, ‘नई दुनिया’ के डिजिटल विंग से जुड़े पत्रकार, एक कांग्रेस कार्यकर्ता तथा ‘राजधानी तक’ न्यूज चैनल के संचालकध्मुख्य समाचार एंकर सहित सोशल मीडिया मंचों से जुड़े प्रतिवादियों का उल्लेख किया गया है. अदालत के समक्ष वादी भूपेन्द्र सिंह की ओर से आरोप लगाया गया था कि उनके विरुद्ध भ्रामक और मानहानिकारक सामग्री को लगातार प्रसारित कराया गया.

उच्च न्यायालय ने आपत्तिजनक वीडियो, लेखों और सोशल मीडिया पोस्टों को प्रथम दृष्टया देखने के बाद कहा कि इनमें से अनेक पोस्ट जानबूझकर वादी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने और मामले को सनसनीखेज बनाने का प्रयास करती प्रतीत होती हैं. उच्च न्यायालय के अनुसार, प्रतिवादी ने सोशल मीडिया पोस्टों और वीडियो श्रृंखला के माध्यम से कथित मानहानिकारक अभियान को आगे बढ़ाया. 

हाईकोर्ट के अनुसार, पत्रकारिता संबंधी जांच के नाम पर पूछे गए सवालों को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया कि उनसे यह धारणा बनती है कि वादी ने सक्रिय रूप से प्रताड़ित किया, जबकि प्रसारित आरोपों और उनसे तैयार किए गए पक्षपाती कथानक के समर्थन में कोई दस्तावेजी प्रमाण सामने नहीं रखा गया है.

प्रकाशनों में आलोचना नहीं बल्कि उत्पीड़क के रूप में किया गया प्रस्तुत- HC

उच्च न्यायालय ने अपने निष्कर्ष में कहा कि विवादित वीडियो, पोस्ट और प्रकाशनों को प्रथम दृष्टया देखने पर वे निष्पक्ष रिपोर्टिंग अथवा तथ्यात्मक आलोचना प्रस्तुत करते हुए दिखाई नहीं देते. बल्कि इन सामग्रियों में मामले पर समय से पहले ही निष्कर्ष निकालते हुए वादी को बिना किसी तथ्यात्मक आधार या न्यायिक निर्धारण के तानाशाह और उत्पीड़क के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

किसी व्यक्ति की गरिमा को अपमानित करने की नहीं दी जा सकती- हाईकोर्ट

उच्च न्यायालय ने आदेश में स्पष्ट किया कि किसी सार्वजनिक व्यक्ति की सार्वजनिक आलोचना की सीमा सामान्य व्यक्ति की तुलना में अधिक व्यापक होती है, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के नाम पर किसी व्यक्ति की गरिमा और सम्मान को बदनाम या अपमानित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. 

न्यायालय ने कहा कि मानहानि और सार्वजनिक आलोचना के बीच बहुत महीन अंतर है और इस संतुलन को बनाए रखना न्यायालयों का महत्वपूर्ण दायित्व है. आदेश में लक्ष्मी मुर्देश्वर पुरी बनाम साकेत गोखले मामले की टिप्पणी का उल्लेख करते हुए कहा गया कि सोशल मीडिया के दौर में किसी सार्वजनिक व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना बेहद आसान हो गया है तथा वर्षों की निस्वार्थ सेवा से अर्जित प्रतिष्ठा को एक विचारहीन टिप्पणी भी गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है. 

प्रेस की स्वतंत्रता निरंकुश नहीं- हाईकोर्ट

उच्च न्यायालय ने कहा कि मीडिया की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार तथा संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत व्यक्ति के जीवन, गरिमा और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के बीच नाजुक संतुलन बनाए रखना आवश्यक है. प्रेस को जनहित के विषयों पर रिपोर्टिंग करने की स्वतंत्रता है, लेकिन यह स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है और इसका प्रयोग सावधानी एवं जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए. मीडिया मंचों को किसी व्यक्ति की चरित्र-हत्या से बचना चाहिए, क्योंकि इससे जनता के मन में पूर्वाग्रह पैदा होने के साथ उसकी प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है.

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी कहा कि जब समाचार रिपोर्टिंग समय से पहले किसी निष्कर्ष को व्यक्त करने लगे और प्रभावी रूप से उस न्यायिक प्रक्रिया का स्थान लेने लगे, जो केवल न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में है, तो ऐसी स्थिति ‘मीडिया ट्रायल’ का रूप ले लेती है.

उच्च न्यायालय के अनुसार, मीडिया द्वारा इस प्रकार समानांतर जांच और अन्वेषण किया जाना न्याय के मूल सिद्धांतों को कमजोर करता है. इसलिए अप्रमाणित आरोपों के गंभीर परिणामों से नागरिकों की रक्षा के लिए ऐसी प्रवृत्ति पर उचित नियंत्रण आवश्यक है, विशेषकर तब जब आरोपों को सनसनीखेज रूप देकर प्रस्तुत किया जा रहा हो.

संबंधित पोस्ट हटाने के निर्देश

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का अवलोकन करने के बाद उच्च न्यायालय प्रथम दृष्टया इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि प्रतिवादियों द्वारा प्रसारित और प्रकाशित पोस्ट तथा वीडियो अप्रमाणित दावों को सनसनीखेज बनाते हैं और वादी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का प्रयास करते हैं. उच्च न्यायालय ने इन परिस्थितियों में प्रतिवादियों को अगली सुनवाई तक वादी के खिलाफ इस तरह के अथवा इसी प्रकार के मानहानिकारक आरोप वाली कोई पोस्ट प्रकाशित करने से रोकने का आदेश दिया है.

प्रतिवादियों को दो हफ्ते में जवाब दाखिल करने का आदेश

साथ ही प्रतिवादी रविन्द्र जैन, अभिषेक जैन तथा आशुतोष शर्मा को तालिका में सूचीबद्ध यूट्यूब पर प्रसारित मानहानिकारक पोस्ट और वीडियो तत्काल हटाने तथा अगली सुनवाई तक उस स्थिति को बनाए रखने के निर्देश दिए हैं. उच्च न्यायालय ने सभी प्रतिवादियों को दो हफ्ते में अपना जवाब दाखिल करने का आदेश देते हुए सुनवाई के लिये 5 नवम्बर 2026 की तारीख नीयत की है.

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विनोद आर्य मध्य प्रदेश के सागर से एक अनुभवी पत्रकार हैं. उन्होंने  डॉ हरि सिंह गौर विश्विद्यालय सागर, बीएससी और एमए (समाजशास्त्र) की शिक्षा प्राप्त की है. पिछले 32 वर्षों से पत्रकारिता में कार्यरत हैं. वो साल 2010 से एबीपी न्यूज़ के साथ जुड़े हैं.

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