झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का मंलगवार (5 अगस्त) को अंतिम संस्कार किया गया. पार्थिव शरीर को उनके पैतृक गांव नेमरा में उनके बेटे और सीएम हेमंत सोरेन ने मुखाग्नि दी. झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के सह-संस्थापक शिबू सोरेन का सोमवार (4 अगस्त) को दिल्ली के प्राइवेट अस्पताल में गुर्दे संबंधी बीमारी के इलाज के दौरान निधन हो गया. वह 81 वर्ष के थे.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित अन्य नेताओं ने राष्ट्रीय राजधानी में दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि अर्पित की थी.  जब दिग्गज आदिवासी नेता के पार्थिव शरीर को पूरे आदिवासी रीति-रिवाज के साथ गांव में उनके पैतृक घर पर फूलों से सजी चारपाई पर रखा गया, तो उनके करीबी और प्रियजन कफन, चादर, शॉल और गुलदस्ते चढ़ाने के लिए उमड़ पड़े.

शिबू सोरेन के पार्थिव शरीर को जिस ताबूत में रखा गया था , उसे तिरंगे और जेएमएम के झंडे में लपेटा गया था. व्हीलचेयर पर बैठी शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन अपने आंसू नहीं रोक पा रही थीं, जबकि उनके बेटे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और विधायक बसंत सोरेन तथा विधायक बहू कल्पना सोरेन शांतचित्त थे और उनके चेहरे पर गहरे दुख का भाव साफ देखा जा सकता था.

कल्पना सोरेन अपने दोनों बेटों को सांत्वना देती नजर आईं. सोरेन का पैतृक आवास अंतिम दर्शन के लिए आए लोगों से भरा हुआ था और कई लोग अपने आंसू नहीं रोक पा रहे थे. इससे पहले, जब शिबू सोरेन का पार्थिव शरीर रांची स्थित राज्य विधानसभा से करीब 75 किलोमीटर दूर पैतृक गांव नेमरा ले जाया जा रहा था, तो लोग सड़क के दोनों ओर अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए कतार में खड़े थे और ‘गुरुजी अमर रहें’ के नारे लगा रहे थे.

शिबू सोरेन के बेटे एवं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सफेद कुर्ता-पायजामा पहने और कंधे पर पारंपरिक आदिवासी गमछा डाले हुए, हाथ जोड़े वाहन में बैठे दिखाई दिए. उनके काफिले के पीछे वाहनों की कतार लगी थी.  दिवंगत नेता के सम्मान में रांची में अधिकतर दुकानें और प्रतिष्ठान दिन के पहले पहर बंद रहे.

आम आदमी पार्टी (आप) के सांसद संजय सिंह, तृणमूल कांग्रेस की सांसद शताब्दी रॉय और पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव समेत कई अन्य नेता पहले ही रांची पहुंच चुके. शिबू सोरेन के सम्मान में झारखंड सरकार ने छह अगस्त तक तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है. झारखंड के अधिकतर स्कूल मंगलवार को बंद हैं और कई विद्यालयों में दिवंगत नेता की शांति के लिए विशेष प्रार्थना सभाएं की गई.

राज्यसभा की कार्यवाही भी सोमवार को वर्तमान सांसद शिबू सोरेन के निधन के बाद उनके सम्मान में पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई थी.  झारखंड विधानसभा का मौजूदा मानसून सत्र उनके निधन की घोषणा के बाद अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया. मानसून सत्र एक अगस्त से शुरू हुआ था. इससे पहले दिन में शिबू सोरेन का पार्थिव शरीर राज्य विधानसभा लाया गया, जहां राज्यपाल संतोष गंगवार और विधानसभा अध्यक्ष रवींद्र नाथ महतो ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की.

केंद्रीय मंत्री जुएल ओराम, अन्नपूर्णा देवी और संजय सेठ, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, राज्य के मंत्री इरफान अंसारी, दीपिका पांडे सिंह, शिल्पी नेहा तिर्की और कई विधायकों, नौकरशाहों, पुलिस महानिदेशक अनुराग गुप्ता और मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव अविनाश कुमार, जेएमएम कार्यकर्ताओं और आम लोगों ने विधानसभा परिसर में शिबू सोरेन को श्रद्धांजलि अर्पित की.  

शिबू सोरेन का पार्थिव शरीर दिल्ली से एक विशेष विमान द्वारा रांची लाया गया. उनके साथ उनके बेटे हेमंत और बसंत तथा बहू कल्पना भी थीं.फूलों से सजे एक खुले वाहन में पार्थिव शरीर को हवाई अड्डे से रांची के मोरहाबादी क्षेत्र में सोरेन के आवास तक ले जाया गया, इस दौरान मुख्यमंत्री और उनके विधायक भाई पिता के पार्थिव शरीर के पास बैठे रहे.कल्पना सोरेन वाहन में आगे बैठी नजर आईं.  उन्होंने (कल्पना ने) कहा, ‘‘सब कुछ वीरान हो गया है... आपका संघर्ष, आपका प्यार, आपके विश्वास- आपकी यह बेटी कभी नहीं भूलेगी.’’  

हेमंत सोरेन ने ‘एक्स’ पर एक भावुक पोस्ट में कहा कि अपने पिता के निधन के बाद वह अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से गुज़र रहे हैं. उन्होंने ‘एक्स’ पर लिखा, ‘‘मैं अपने जीवन के सबसे कठिन दिनों से गुज़र रहा हूं. मेरे सिर से सिर्फ पिता का साया नहीं गया, (बल्कि) झारखंड की आत्मा का स्तंभ चला गया. मैं उन्हें सिर्फ ‘बाबा’ नहीं कहता था, (बल्कि) वह मेरे पथप्रदर्शक थे, मेरे विचारों की जड़ें थे, और उस जंगल जैसी छाया थे, जिसने हजारों-लाखों झारखंडियों को धूप और अन्याय से बचाया.’’

उन्होंने कहा, ‘‘मेरे बाबा की शुरुआत बहुत साधारण थी. नेमरा गांव के उस छोटे से घर में जन्मे, जहां गरीबी थी, भूख थी, पर हिम्मत थी. बचपन में ही उन्होंने अपने पिता को खो दिया, जमींदारी के शोषण ने उन्हें एक ऐसी आग दी, जिसने उन्हें पूरी जिंदगी संघर्षशील बना दिया.’’ मुख्यमंत्री ने कहा, ‘‘मैंने उन्हें देखा है हल चलाते हुए, लोगों के बीच बैठते हुए, सिर्फ भाषण नहीं देते थे, लोगों का दुःख-दर्द अपना मानते थे. बचपन में जब मैं उनसे पूछता था, ‘बाबा, आपको लोग दिशोम गुरु क्यों कहते हैं? तो वह मुस्कुराकर कहते, ‘क्योंकि बेटा, मैंने सिर्फ उनका दुख समझा’ और उनकी लड़ाई अपनी बना ली.’’

सीएम हेमंत सोरेन ने कहा, ‘‘वो उपाधि न किसी किताब में लिखी गई थी, न संसद ने दी- झारखंड की जनता के दिलों से निकली थी. ‘दिशोम’ मतलब समाज, ‘गुरु’ मतलब जो रास्ता दिखाए. और सच कहूं तो बाबा ने हमें सिर्फ रास्ता नहीं दिखाया, हमें चलना सिखाया.’’उन्होंने कहा, ‘‘बचपन में मैंने उन्हें सिर्फ संघर्ष करते देखा, बड़े बड़ों से टक्कर लेते देखा, मैं डरता था पर बाबा कभी नहीं डरे. वह कहते थे, ‘अगर अन्याय के खिलाफ खड़ा होना अपराध है, तो मैं बार-बार दोषी बनूंगा.’’