Srinagar News: पति ने निकाला, पुलिस ने लौटाया, 6 साल भटकी शमीमा, श्रीनगर जन सुनवाई में मिला इंसाफ
Jammu Kashmir News: श्रीनगर की शमीमा को 6 साल बाद राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की जन सुनवाई से न्याय मिला. घरेलू हिंसा की शिकार शमीमा के मामले में पुलिस को 15 दिन का अल्टीमेटम दिया गया.

कहते हैं कि इंसाफ की चक्की धीरे पीसती है, लेकिन जब पीसती है तो असर जमीन पर दिखता है. श्रीनगर की रहने वाली 30 साल की शमीमा (बदला हुआ नाम) के लिए यह कहावत छह साल के लंबे और दर्दनाक इंतज़ार के बाद सच साबित हुई है.
घरेलू हिंसा, पति का ज़ुल्म और पुलिस की अनदेखी... शमीमा ने वो सब झेला जो एक महिला को तोड़ देने के लिए काफी है. लेकिन उसने हार नहीं मानी. आखिरकार श्रीनगर में 'राष्ट्रीय महिला आयोग' (NCW) द्वारा लगाई गई 'महिला जन सुनवाई' में शमीमा का दर्द सुना गया और मौके पर ही पुलिस को 15 दिन का अल्टीमेटम थमा दिया गया.
#WATCH | Srinagar, J&K | National Commission for Women (NCW) Chairperson Vijaya Kishor Rahatkar says, "Now that Jammu and Kashmir has become a Union Territory, there cannot be a separate commission, therefore the National Commission for Women will only take care of it..."
— ANI (@ANI) May 19, 2026
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दहलीज से कोर्ट तक... एक अकेली औरत की लड़ाई
शमीमा की शादी को 10 साल हो चुके थे, जिनमें से ज़्यादातर वक्त घरेलू हिंसा और दुर्व्यवहार सहने में बीता. जब ससुराल वालों ने उसे घर से निकाल फेंका, तो उसने पुलिस से गुहार लगाई, लेकिन कोई मदद नहीं मिली. थक-हार कर उसने कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. सालों चली कानूनी लड़ाई के बाद कोर्ट ने शमीमा के हक़ में फैसला सुनाया— उसे गुज़ारा भत्ता और पति के घर में रहने की इजाज़त मिली.
लेकिन विडंबना देखिए, कोर्ट का आदेश हाथ में होने के 6 महीने बाद भी शमीमा बेघर थी. पुलिस उस आदेश को लागू करवाने में नाकाम रही थी.
'जन सुनवाई' में ऑन-द-स्पॉट एक्शन
शमीमा की उम्मीदें तब फिर से जागीं जब वह श्रीनगर में "राष्ट्रीय महिला आयोग आपके द्वार" कार्यक्रम में पहुंची. यह सिर्फ एक सुनवाई नहीं थी, बल्कि सीधा एक्शन था. आयोग ने शमीमा का केस सुना और पुलिस को सख्त निर्देश दिए कि 15 दिन के भीतर कोर्ट का आदेश ज़मीन पर लागू होना चाहिए. शमीमा उन 14 महिलाओं में से एक थी, जिन्हें इस जन सुनवाई में तुरंत राहत मिली. 5 अन्य मामलों में भी पुलिस और प्रशासन को मौके पर ही निर्देश जारी किए गए.
जम्मू-कश्मीर में अपना महिला आयोग क्यों नहीं?
शमीमा की कहानी एक बड़े प्रशासनिक शून्य (Systemic Gap) की तरफ भी इशारा करती है. जब से जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा है (2019), तब से वहां का 'राज्य महिला आयोग' भंग कर दिया गया है.
NCW की अध्यक्ष विजया राहटकर ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया, "जम्मू-कश्मीर अब एक केंद्र शासित प्रदेश (UT) है, और नियम के मुताबिक UT का अपना अलग राज्य महिला आयोग नहीं हो सकता. इसलिए यहां के सारे मामले सीधे 'राष्ट्रीय महिला आयोग' के दायरे में आते हैं." फिलहाल महिलाओं को न्याय के लिए 'ज़िला कानूनी सेवा प्रकोष्ठ' या पुलिस के 'महिला प्रकोष्ठ' पर निर्भर रहना पड़ता है. इस समस्या को सुलझाने के लिए NCW ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से सभी केंद्र शासित प्रदेशों में आयोग का एक भौतिक (Physical) दफ्तर खोलने की अनुमति मांगी है, ताकि महिलाओं को दिल्ली न जाना पड़े.
#WATCH | Srinagar, J&K | National Commission for Women (NCW) Chairperson Vijaya Kishor Rahatkar chairs a meeting - 'Mahila Jansunwai' in Srinagar pic.twitter.com/RM6sW649fG
— ANI (@ANI) May 19, 2026
सिस्टम के लिए अलार्म हैं ये डराने वाले आंकड़े
एक तरफ राज्य महिला आयोग नहीं है, दूसरी तरफ अपराधों का ग्राफ़ तेज़ी से ऊपर जा रहा है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े डराने वाले हैं:
- 2021: 3,900 मामले
- 2022: 3,800 मामले
- 2023: 4,100 मामले
- 2024-25: वित्तीय वर्ष में मामलों में 121% का भारी उछाल दर्ज किया गया. इसमें सिर्फ घरेलू हिंसा के 1,979 मामले शामिल हैं.
अपराध बढ़ रहे हैं, लेकिन न्याय की रफ्तार सुस्त है. सितंबर 2025 तक के आंकड़ों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर की फास्ट ट्रैक अदालतों (FTSCs) में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों के करीब 500 मामले लंबित थे.
शमीमा को तो 6 साल बाद 15 दिन का अल्टीमेटम मिल गया, लेकिन सवाल यह है कि उन सैकड़ों महिलाओं को इंसाफ कब मिलेगा, जो आज भी फाइलों के ढेर के नीचे अपने हक़ की राह देख रही हैं?
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