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Kashmir: लखनपुर हथियार केस में बरामदगी से पहले दर्ज हुई FIR! हाईकोर्ट बोला- मामला बेहद चौंकाने वाला

Kashmir News In Hindi: लखनपुर हथियार बरामदगी मामले में हाई कोर्ट ने जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं. कोर्ट ने पाया कि FIR कथित बरामदगी से पहले दर्ज हुई थी और मूल FIR रिकॉर्ड से भी गायब है.

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने साल 2019 के चर्चित लखनपुर हथियार बरामदगी मामले में जांच प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान एक ऐसी विसंगति पर ध्यान दिया, जिसे उसने बहुत ही चौंकाने वाला पहलू बताया. कोर्ट का कहना है कि रिकॉर्ड में दर्ज समय और घटनाओं के क्रम में बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है, जिसकी गहराई से जांच जरूरी है.

यह मामला आरोपी सबील अहमद बाबा की जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया. जस्टिस राहुल भारती ने रिकॉर्ड का अध्ययन करते हुए पाया कि लखनपुर पुलिस स्टेशन में FIR संख्या 0061/2019 कथित तौर पर 12 सितंबर 2019 को सुबह 8:30 बजे दर्ज की गई थी.

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हैरानी की बात यह है कि अभियोजन पक्ष के अनुसार जिस ट्रक से हथियार बरामद किए गए, उसे उसी दिन सुबह 9:45 बजे रोका गया था. यानी FIR उस घटना से पहले दर्ज हो गई थी, जिसके आधार पर मामला बनाया गया. कोर्ट ने कहा कि यह एक बेहद गंभीर और असामान्य स्थिति है, जिस पर न्यायिक जांच की जरूरत है.

ट्रक से AK-47 और AK-56 राइफलें मिलने का दावा

अभियोजन पक्ष के अनुसार, सबील अहमद बाबा ट्रक संख्या JK13E-2000 चला रहा था. पुलिस ने लखनपुर में इस ट्रक को रोका और तलाशी के दौरान चार AK-56 राइफलें, दो AK-47 राइफलें और 6 भरी हुई मैगजीन बरामद होने का दावा किया.

पुलिस के मुताबिक, ट्रक में बाबा के अलावा उबैद-उल-इस्लाम और जहांगीर अहमद पर्रे भी मौजूद थे. तीनों को मौके पर हिरासत में ले लिया गया था. बाद में जांच के दौरान बशीर अहमद लोन और सुहैल अहमद डार को भी इस मामले में आरोपी बनाया गया. वहीं छठे आरोपी आशिक अहमद नेंगरू को फरार बताया गया.

मूल FIR रिकॉर्ड से गायब मिलने पर भी कोर्ट सख्त

सुनवाई के दौरान एक और बड़ा सवाल तब खड़ा हुआ जब कोर्ट को पता चला कि इस मामले की मूल FIR ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड में मौजूद ही नहीं है. मार्च 2020 में पुलिस द्वारा दाखिल अंतिम रिपोर्ट में ओरिजिनल FIR शामिल नहीं थी.

इस पर हाई कोर्ट ने संबंधित NIA कोर्ट से रिपोर्ट मांगी. जवाब में तीसरे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जम्मू ने बताया कि कोविड-19 प्रतिबंधों के दौरान चालान पीठासीन अधिकारी के आवास पर पेश किया गया था. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मूल FIR पहले मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कठुआ के पास जमा कराई गई थी और बाद में NIA कोर्ट ने उसे मंगवाया था.

हालांकि, रिकॉर्ड के अनुसार ओरिजिनल FIR कभी प्राप्त नहीं हुई और बाद में अभियोजन पक्ष से उसकी केवल एक कॉपी उपलब्ध कराई गई. इस तथ्य को भी हाई कोर्ट ने गंभीरता से लिया है.

जांच अधिकारी को तलब करने के निर्देश

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने अभियोजन पक्ष को निर्देश दिया है कि वह यह स्पष्ट करे कि जांच अधिकारी और तत्कालीन डीएसपी कमल देव भगत अभी सेवा में हैं या सेवानिवृत्त हो चुके हैं.

कोर्ट ने कहा कि यदि डीएसपी कमल देव भगत अभी भी सेवा में हैं, तो उन्हें अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना होगा. इससे साफ है कि अदालत जांच प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों के जवाब सीधे जिम्मेदार अधिकारियों से जानना चाहती है.

इस मामले में याचिकाकर्ता सबील अहमद बाबा और उसके दो सह-आरोपी 12 सितंबर 2019 से हिरासत में हैं. वे फिलहाल विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बंद हैं.

सुनवाई के दौरान जस्टिस राहुल भारती ने याचिकाकर्ता के वकील शिवन महाजन को यह भी निर्देश दिया कि वे उन गवाहों की पूरी समय-रेखा अदालत के सामने पेश करें, जिनके बयान दर्ज हो चुके हैं और जिनकी गवाही अभी बाकी है.

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5 जून को होगी अगली सुनवाई

हाई कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 5 जून 2026 के लिए निर्धारित की है. माना जा रहा है कि उस दिन FIR के समय, बरामदगी की प्रक्रिया और रिकॉर्ड में सामने आई अन्य अनियमितताओं पर विस्तार से चर्चा हो सकती है.

गौरतलब है कि यह मामला उस दौर का है जब अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा एजेंसियां आतंकवाद और हथियारों की तस्करी को रोकने के लिए व्यापक अभियान चला रही थीं. ऐसे में इस हाई-प्रोफाइल मामले में सामने आए सवालों ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर नई बहस छेड़ दी है.

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