मेवात में बड़े ही हर्षोल्लास से मनाई गई बकरीद, मांगी मुल्क की तरक्की और भाईचारे की दुआ
Eid Al Adha: हरियाणा के मेवात जिले मे नमाज अदा करने के बाद लोगों ने एक-दूसरे से गले मिलकर मुबारकबाद दी. इस पर्व को लेकर लोगों में खासा उत्साह नजर आया. यहां मौलानाओं ने ईदगाह में नमाज अदा कराई.

- इस्लामिक मान्यताओं अनुसार, निर्धारित दिनों में कुर्बानी होती है.
आज देशभर में बकरीद के त्योहार को लेकर उत्साह देखने को मिल रहा है. हरियाणा के नूंह जिले (जिसे पहले मेवात के नाम से जाना जाता था) में भी बकरी ईद का त्यौहार पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है. लोगों ने जगह-जगह ईदगाहों में पहुंचकर ईद की नमाज पढ़ी तथा अल्लाह से मुल्क में अमन-शाति व तरक्की की दुआ की.
नमाज अदा करने के बाद लोगों ने एक-दूसरे से गले मिलकर मुबारकबाद दी. इस पर्व को लेकर लोगों में खासा उत्साह नजर आया. बकरी ईद की नमाज अदा करने के लिए लोग नए कपड़े व सिर पर टोपी पहनकर गावों से कस्बों की ईदगाह के लिए रवाना हुए. यहां मौलानाओं ने ईदगाह में नमाज अदा कराई.
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मेवात में दिखा उत्साह
मेवात ही नहीं, बल्कि देश भर में मुसलमानों का ये पर्व ईद के बाद सबसे बड़ा पर्व है. पिनगवां के मौलाना जहीर अहमद ने पिनगवां ईदगाह में ईद की नमाज अदा करवाई. ईद की नमाज अदा करने के लिए सुबह 7 बजे से ही लोगों का ईदगाह में पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था. बच्चे बड़े सभी नए कपड़े पहन कर खुशी-खुशी ईद की नमाज अदा करने पहुंचे. नमाज के बाद लोगों ने न केवल कुरबानी की, बल्कि एक दूसरे को गले मिल कर ईद की मुबारकबाद दी. मौलाना ने सभी मेवात वासियों से बकरीद के मौके पर प्रतिबंधित पशु की कुर्बानी ना करने की अपील है.
क्यों मनाई जाती है बकरीद और कब दी जाती है कुर्बानी
ईद उल जुहा का पर्व नबी के द्वारा अपने बेटे की कुरबानी देने के बाद से हर साल मनाया जाता है. इसके बाद जादातर लोगों ने घर जाकर कुरबानी में हिस्सा लिया. नूंह, पिनगवां, पुन्हाना, तावडू, फिरोजपुर झिरका, नगीना में लाखो लोगों ने ईद की नमाज अदा की. बता दें कि आज सुबह की नमाज के बाद से कुर्बानी शुरू हो गई. इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, नमाज से पहले दी गई कुर्बानी का कोई मान्य नहीं होता है, इसलिए सुबह होते ही लोग मस्जिदों और ईदगाहों में नमाज अदा करने पहुंचने लगते हैं. इस्लामी जानकारों की मानें तो ईद-उल-अजहा की कुर्बानी सिर्फ 'अय्याम-ए-नहर' यानी निर्धारित दिनों में ही होती है. इस्लामिक कैलेंडर के 12वें महीने का नाम जिलहिज्ज (Dhul-Hijjah) है और कुर्बानी इसी महीने की 10, 11 और 12 तारीख दी जाती है.























