हिंदी साहित्य जगत का विराट व्यक्तित्व, ज्ञानपीठ से सम्मानित और साहित्य प्रेमियों के सबसे प्रिय कवि विनोद कुमार शु्क्ल ने दुनिया को अलविदा कह दिया. विनोद कुमार शुक्ल ने 89 साल की उम्र में रायपुर के अस्पताल में अंतिम सांस ली. उनके जाने का दुख साहित्य से जुड़े हर व्यक्ति के दिल में बसा है. लोकप्रिय कवि कुमार विश्वास भी विनोद कुमार शुक्ल के निधन पर भावुक हुए.
कुमार विश्वास ने कहा, "विनोद कुमार शुक्ल का जाना साहित्य के एक युग का अवसान होना है. हम जैसे लोग जो 70 के दशक में पैदा हुए, 80 के दशक में जिन्हें कविताओं को समझने-सुनने की चेतना जगी, उनके लिए विनोद कुमार शुक्ल हिंदी के मानक नाम थे. उनके सुनना, उन्हें पढ़ना अपने आप में बहुत अद्भुत था."
कुमार विश्वास ने आगे कहा, "हिंदी के कला क्षेत्र में साधक प्रवृत्ति लुप्त हो रही है. एकांत में अपने कोने में बैठकर पढ़ना, सामाजिक तानेबाने से दूर होकर, प्रचार की चिंता न कर लिखते-पढ़ते रहना, अपनी बात कहते रहना और उसे जगत में छोड़ देना... बिना यह सोचे कि उसे स्वीकृति मिलेगी या नहीं मिलेगी, उस प्रक्रिया के आखिरी नामों में विनोद कुमार शुक्ल शामिल थे."
जनवरी के साहित्य उत्सव में खलेगी विनोद कुमार शुक्ल की कमी
प्रिय कवि विनोद कुमार शुक्ल को याद कर कुमार विश्वास बोले, "हमें आशा थी कि वे स्वस्थ हो जाएंगे, कुछ समय पहले प्रधानमंत्री ने भी उनका हालचाल पूछा था. मुख्यमंत्री विष्णु देव साय जब उनसे मिलने गए थे, तो मैंने उन्हें फोन कर के पूछा था कि विनोद कुमार शुक्ल का स्वास्थ्य कैसा है? हमें लगता था जनवरी में होने वाले साहित्य उत्सव में उनके दर्शन होंगे. वे उत्सव की अध्यक्षता और उद्घाटन करेंगे, लेकिन वे अपनी अंतिम यात्रा पर चले गए."
हताशा से जब भी कोई व्यक्ति बैठेगा, विनोद शुक्ल याद आएंगे
इतना ही नहीं, कुमार विश्वास ने कहा, "हिंदी का बहुत बड़ा प्रतीक पुरुष विदा हुआ है. हिंदी का ही नहीं भारतीय भाषा का बहुत बड़ा नुकसान है. विश्व में जब भी हिंदी की बात चलेगी, विनोद कुमार शुक्ल याद आएंगे. जब भी कोई व्यक्ति हताश बैठेगा और उसकी तरफ कोई हाथ बढ़ाएगा, जब भी वो हाथ बढ़ाकर चलेगा, तब तब विनोद कुमार शुक्ल हमारे साथ चलेंगे."