UAPA केस में साढे 4 साल से जेल में बंद खुर्रम परवेज को मिली जमानत, ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द
Khurram Parvez Bail: दिल्ली हाईकोर्ट से साढ़े चार साल जेल में रहने के बाद खुर्रम परवेज को जमानत मिल गई है. दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी जरूरी है.

दिल्ली हाईकोर्ट ने कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज को आतंकवाद के लिए फंडिंग से जुड़े एक मामले में जमानत दे दी है. यह मामला एनआईए ने UAPA के तहत दर्ज किया था. जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुडेजा की बेंच ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दिसंबर 2024 में परवेज की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी.
हाईकोर्ट ने कहा कि खुर्रम परवेज करीब साढ़े चार साल से जेल में हैं, जबकि मुकदमे की सुनवाई अभी शुरुआती चरण में ही है. ऐसे में संविधान के आर्टिकल 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
खुर्रम परवेज के मामले पर कोर्ट ने क्या कहा?
जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि परवेज 22 नवंबर 2021 से हिरासत में हैं और फिलहाल मामले में आरोप तय करने पर बहस चल रही है. NIA इस केस में 197 गवाह पेश करने वाली है, इसलिए मुकदमे के जल्द खत्म होने की संभावना नहीं दिखती.
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि लंबे समय तक जेल में रखना किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का सवाल है. ऐसे मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार यूएपीए की कड़ी शर्तों से भी ऊपर हो सकता है.
एनआई ने लगाया था ये आरोप
अदालत ने साफ किया कि वह मामले के तथ्यों और आरोपों पर कोई अंतिम राय नहीं दे रही है. आरोप सही हैं या नही इसका फैसला ट्रायल के दौरान ही होगा. NIA का आरोप है कि प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े नेटवर्क के लिए ओवर ग्राउंड वर्कर्स की भर्ती खुफिया जानकारी जुटाने और आतंकियों को फंडिंग पहुंचाने का काम किया जाता था. इसी जांच के दौरान खुर्रम परवेज को गिरफ्तार किया गया था, जबकि उनका नाम मूल एफआईआर में नहीं था.
खुर्रम परवेज की तरफ से कोर्ट में दी गई ये दलील
चार्जशीट में दावा किया गया है कि परवेज ने LeT के लिए OGWs की भर्ती की सेना की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी जुटाई. पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों से संपर्क रखा और 2016 में बुरहान वानी की मौत के बाद विरोध प्रदर्शनों को भड़काया.
वहीं परवेज का कहना है कि उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है. उन्होंने अदालत में दलील दी कि किसी प्रतिबंधित आतंकी संगठन के सदस्य से उनके संपर्क का कोई डिजिटल रिकॉर्ड नहीं मिला है और न ही उन्हें किसी आतंक फंडिंग नेटवर्क से जोड़ने वाला कोई वित्तीय सबूत सामने आया है. इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत देने का फैसला सुनाया.
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