'अडल्ट डायपर से GST हटे, 6 महीने में करें फैसला', दिल्ली हाईकोर्ट का केंद्र सरकार को अल्टीमेटम
Delhi News: दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और जीएसटी काउंसिल को वयस्क डायपर पर टैक्स हटाने पर छह महीने में फैसला लेने को कहा है. याचिकाकर्ताओं ने इसे दिव्यांग और कमजोर वर्ग पर आर्थिक बोझ बताया है.

हाल ही में अडल्ट डायपर पर जीएसटी हटाने को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को अल्टीनेटम जारी कर दिया है. दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार और जीएसटी काउंसिल से कहा है कि वे 6 महीने के भीतर यह तय करें कि वयस्क क्लिनिकल डायपर पर लगने वाला जीएसटी खत्म किया जा सकता है या नहीं. दिल्ली हाई कोर्ट ने यह निर्देश दो दिव्यांग व्यक्तियों, स्वर्णलता जे और टीएस गुरुप्रसाद की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया.
याचिकाकर्ताओं ने 3 सितंबर को जीएसटी काउंसिल को दिया था आवेदन
दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस नितिन वासुदेव सांबरे और जस्टिस अजय डिगपॉल की बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने 3 सितंबर 2025 को सरकार और जीएसटी काउंसिल को जो आवेदन दिया था, उस पर अब तक कोई फैसला नहीं हुआ है. इसलिए संबंधित पक्ष इस पर विचार कर छह महीने के भीतर अपना निर्णय बताएं.
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि वयस्क डायपर इस्तेमाल करने वाले लोग बेहद कमजोर वर्ग से आते हैं, इसलिए इस जरूरी उत्पाद को टैक्स से मुक्त किया जाना चाहिए. वहीं जीएसटी काउंसिल की ओर से पेश वकील ने कहा कि किसी वस्तु पर टैक्स लगाना या हटाना नीति से जुड़ा फैसला है, जो सभी राज्यों के प्रतिनिधियों वाली काउंसिल मिलकर लेती है.
80 प्रतिशत दिव्यांग याचिकाकर्ता ने कोर्ट में दाखिल की है अर्जी
दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल याचिका के अनुसार स्वर्णलता 80 प्रतिशत दिव्यांग हैं और प्राइमरी प्रोग्रेसिव मल्टीपल स्क्लेरोसिस से पीड़ित हैं. वह चल-फिर नहीं सकतीं और उन्हें हर समय देखभाल की जरूरत रहती है. उन्हें रोजाना 8 से 10 वयस्क डायपर इस्तेमाल करने पड़ते हैं. उनके पति और देखभाल करने वाले गुरुप्रसाद भी 40 प्रतिशत दिव्यांग हैं. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वयस्क डायपर दिव्यांगों, बुजुर्गों और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए जरूरी स्वच्छता उत्पाद है.
वयस्क डायपर पर लगता है 5 प्रतिशत का टैक्स - याचिकाकर्ता
2018 में सैनिटरी नैपकिन को जीएसटी से पूरी तरह छूट मिल चुकी है, लेकिन वयस्क डायपर पर अभी भी 5 प्रतिशत टैक्स लगता है, जिससे कमजोर वर्ग पर आर्थिक बोझ पड़ता है. याचिका में यह भी कहा गया कि यह स्थिति संविधान के आर्टिकल 14, 19 और 21 तथा दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 का उल्लंघन है.
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