'घर संभालना भी है काम', दिल्ली हाईकोर्ट ने मेंटेनेंस को लेकर पत्नी के हक में दिया बड़ा फैसला
Delhi High Court News: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि घर संभालना और बच्चे की परवरिश भी मूल्यवान काम है. केवल कमाई न होने के आधार पर पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता.

घरेलू काम को अक्सर 'काम' नहीं माना जाता, लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि घर संभालना और बच्चे की परवरिश करना भी उतना ही अहम और मूल्यवान काम है. अगर पत्नी पढ़ी-लिखी है या काम करने में सक्षम है, तो सिर्फ इसी आधार पर उसे गुजारा भत्ता देने से मना नहीं किया जा सकता. जब तक यह साबित न हो कि वह वास्तव में पर्याप्त कमाई कर रही है, तब तक उसे मेंटेनेंस से वंचित करना गलत होगा.
मामला एक ऐसे दंपत्ति से जुड़ा था, जहां पति साल 2015 से कुवैत में नौकरी कर रहा है, जबकि पत्नी नाबालिग बच्चे के साथ भारत में रह रही है. पत्नी ने धारा 125 सीआरपीसी और पीडब्ल्यूडीवी एक्ट के तहत भरण-पोषण की मांग की थी. निचली अदालत ने बच्चे के लिए रकम तय की, लेकिन पत्नी को मेंटेनेंस देने से इनकार कर दिया था.
पत्नी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
अब मामला दिल्ली हाई कोर्ट में गया. हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जस्टिस डॉ. स्वर्णा कांता शर्मा की बेंच ने की. कोर्ट ने कहा कि कमाने की क्षमता और वास्तव में कमाई दो अलग बातें हैं. हमारे देश में अक्सर शादी के बाद महिलाएं नौकरी छोड़ देती हैं, कभी दूसरे शहर शिफ्ट होने की वजह से, तो कभी बच्चों और परिवार की जिम्मेदारियों के कारण. ऐसे में लंबे अंतराल के बाद तुरंत नौकरी मिल जाना आसान नहीं होता.
लोन और ईएमआई का बहाना नहीं चलेगा
हाई कोर्ट ने पाया कि पति की मासिक आय 5,000 से 6,400 अमेरिकी डॉलर यानी करीब 4 से 5.3 लाख रुपये के बीच है. उसके पास एक करोड़ रुपये से ज्यादा की एफडी भी है. कोर्ट ने साफ कहा कि स्वेच्छा से लिए गए लोन या ईएमआई का हवाला देकर मेंटेनेंस की जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता.
अदालत ने आदेश दिया कि पत्नी को 50 हजार रुपये और बच्चे को 40 हजार रुपये प्रति माह अंतरिम मेंटेनेंस दिया जाए. साथ ही यह भी कहा कि दोनों अलग-अलग कानूनों के तहत दी गई रकम में समायोजन किया जाए, ताकि दोहरा भुगतान न हो.
आपसी सहमति से हल निकालने की सलाह
कोर्ट ने दोनों पक्षों को यह भी सलाह दी कि वे आपसी सहमति से मामला सुलझाने की कोशिश करें, खासकर जब बात बच्चे के भविष्य की हो. इस फैसले को घरेलू महिलाओं के सम्मान और आर्थिक सुरक्षा की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है.
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Source: IOCL
























