क्या मामूली आरोप में भी लिया जाएगा बायोमेट्रिक सैंपल? दिल्ली HC ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब
Delhi News in Hindi: दिल्ली हाई कोर्ट ने क्रिमिनल प्रोसीजर आइडेंटिफिकेशन एक्ट 2022 को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार से जवाब मांगा है.

दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार के क्रिमिनल प्रोसीजर आइडेंटिफिकेशन एक्ट 2022 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए गृह मंत्रालय, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने सभी पक्षों से इस मामले में जवाब दाखिल करने को कहा है.
यह याचिका दिल्ली की एक यूनिवर्सिटी के दो छात्रों ने दायर की है. छात्रों का कहना है कि पिछले साल एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने के दौरान पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया और उनकी इच्छा के खिलाफ बायोमेट्रिक सैंपल देने के लिए दबाव बनाया. उन्होंने कोर्ट से मांग की है कि पुलिस द्वारा लिया गया उनका डेटा तुरंत हटाया और नष्ट किया जाए.
क्या कहता है क्रिमिनल प्रोसीजर आइडेंटिफिकेशन कानून?
दरअसल, साल 2022 में लागू इस नए कानून ने 1920 के पुराने कानून की जगह ली थी. इसके तहत पुलिस को अधिकार है कि वह गिरफ्तार लोगों, आरोपियों और कुछ मामलों में हिरासत में लिए गए व्यक्तियों से फिंगरप्रिंट, फोटो, रेटिना स्कैन, डीएनए सैंपल और अन्य पहचान संबंधी जानकारी ले सके. यह डेटा NCRB के पास भेजा जाता है और इसे 75 साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है.
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
दिल्ली हाई कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने कोर्ट में कहा कि मामूली आरोप या किसी प्रदर्शन में शामिल होने जैसे मामलों में भी लोगों की निजी जानकारी लंबे समय तक रखना उनके निजता के अधिकार का उल्लंघन है.
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुट्टस्वामी फैसले का हवाला देते हुए कहा कि निजता संविधान द्वारा दिया गया मौलिक अधिकार है. याचिका में यह भी कहा गया है कि कानून में डेटा सुरक्षा और उसके इस्तेमाल को लेकर पर्याप्त सुरक्षा प्रावधान नहीं हैं.
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