कुर्बानी के विरोध पर दिल्ली जामा मस्जिद के नायब शाही इमाम शाबान बुखारी का बड़ा बयान, 'यह तो हजरत इब्राहीम...'
Bakrid 2025: दिल्ली की जामा मस्जिद के नायब शाही इमाम मौलाना सैयद शाबान बुखारी ने मुस्लिमों से अपील की है कि बकरीद पर कुर्बानी बंद जगहों पर ही करें और लोगों की भावनाओं को ठेस न पहुंचाएं.

Shaban Bukhari On Bakrid 2025: दिल्ली की जामा मस्जिद के नायब शाही इमाम मौलाना सैयद शाबान बुखारी ने बकरीद को लेकर मुस्लिम समुदाय से खास अपील की है. शाबान बुखारी ने कहा कि ईद-उल-अजहा मुसलमानों के खुशियों के दिनों में से एक दिन है. मेरी लोगों से गुजारिश है कि बकरीद पर कुर्बानी बंद जगहों पर ही करें.
नायब शाही इमाम ने आगे कहा कि सरकार के गाइडलाइंस का पालन करें. सड़कों या खुली जगहों पर कुर्बानी न करें. साफ-सफाई का पूरा ख्याल रखें. उन्होंने कहा कि दूसरे लोगों की जज्बातों का ध्यान रखें.
कुर्बानी की तस्वीर न करें सोशल मीडिया पर शेयर- शाबान बुखारी
उन्होंने अपील की कि कुर्बानी की तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर न करें. ये इबादत है, इसे नफरत का कारण न बनाएं. हमें सोशल मीडिया पर ऐसी चीजें शेयर नहीं करनी चाहिए. लोगों की भावनाओं और आस्थाओं को ठेस न पहुंचाएं.
सांकेतिक कुर्बानी को लेकर क्या बोले नायब शाही इमाम शाबान बुखारी?
इसके अलावा सैयद शाबान बुखारी ने कुर्बानी के विरोध, सांकेतिक कुर्बानी और जीव हत्या नहीं करने के सवाल पर कहा कि यह तो हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत है. हिंदुस्तान में जैसे दूसरे त्योहार मनाएं जाते हैं, उसी तरह बकरीद है. इसमें किसी को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए.
बता दें कि 7 जून का बकरीद का त्योहार मनाया जाएगा. उससे पहले कुर्बानी को लेकर विवाद शुरू हो गया है. कई हिंदुवादी संगठनों की ओर से जीव हत्या पर रोक लगाने की मांग करते हुए कुर्बानी का विरोध किया जा रहा है.
मौलाना काब रशीदी ने कुर्बानी के विरोध पर क्या कहा था?
इसे लेकर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के लीगल एडवाइजर मौलाना काब रशीदी ने हाल ही में प्रतिक्रिया भी दी थी. उन्होंने कहा कि कुर्बानी पर सवाल उठाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी केवल मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए सामने आते हैं, जबकि देश में पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 (प्रिवेंशन ऑफ क्रूएल्टी टू एनिमल्स एक्ट) स्पष्ट रूप से धार्मिक मान्यताओं के आधार पर दी जाने वाली कुर्बानी को इस कानून के दायरे से बाहर रखता है.
मौलाना रशीदी ने कहा था, “पार्लियामेंट ने 1960 में यह कानून बनाया था, जिसमें साफ कहा गया है कि धार्मिक उद्देश्यों के लिए पशु बलि या कुर्बानी इस अधिनियम के अंतर्गत नहीं आएगी. चाहे वह किसी भी धर्म की मान्यता हो, बलि हो या कुर्बानी, उसमें कोई कानूनी बाध्यता नहीं है. भारत आजादी के समय से इस नियम का पालन करता आ रहा है.”
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