UGC इक्विटी रेगुलेशंस को लेकर देश भर में विवाद जारी है. इसी बीच उस संसदीय समिति के अध्यक्ष रहे दिग्विजय सिंह ने फेसबुक पोस्ट के जरिए अपना पक्ष रखा है. उन्होंने स्पष्ट किया कि फरवरी 2025 से जनवरी 2026 तक इस प्रक्रिया में क्या हुआ, किसकी भूमिका क्या रही और किन सिफारिशों को UGC ने स्वीकार या अस्वीकार किया. यह पोस्ट देशभर में चल रहे छात्र विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में अहम मानी जा रही है. आइए जानते हैं दिग्विजय सिंह ने क्या कुछ कहा है.

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संसदीय समिति की भूमिका और सिफारिशें

दिग्विजय सिंह ने अपने नोट में बताया कि फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट की पहल और पायल तड़वी व रोहित वेमुला की माताओं की मांगों के बाद मोदी सरकार और UGC ने ड्राफ्ट इक्विटी रेगुलेशंस जारी किए थे. इसके बाद दिसंबर 2025 में शिक्षा पर संसदीय स्थायी समिति ने इन ड्राफ्ट नियमों की समीक्षा की और सर्वसम्मति से रिपोर्ट अपनाई.

समिति ने नियमों को मजबूत करने के लिए कई सिफारिशें दीं, जिनमें OBC छात्रों के खिलाफ उत्पीड़न को जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में शामिल करना, दिव्यांगता को भेदभाव के आधार के रूप में मान्यता देना और सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता, कानूनी मदद व वार्षिक सार्वजनिक खुलासे को अनिवार्य करना शामिल था.

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किन सिफारिशों को UGC ने नहीं माना?

पोस्ट में दिग्विजय सिंह ने बताया कि जनवरी 2026 में जारी अंतिम UGC इक्विटी रेगुलेशंस में समिति की सिफारिश A, B और E को स्वीकार किया गया, लेकिन दो अहम बिंदुओं को नजरअंदाज कर दिया गया. इनमें इक्विटी कमेटी में SC, ST और OBC समुदायों का 50 प्रतिशत से अधिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की सिफारिश और भेदभाव की स्पष्ट पहचान वाली विस्तृत सूची शामिल करने का सुझाव था.

उन्होंने कहा कि भेदभाव की साफ परिभाषा न होने से संस्थानों को शिकायत सही या गलत तय करने का मनमाना अधिकार मिल जाता है, जिससे नियमों का दुरुपयोग या गलत इस्तेमाल संभव हो जाता है.

छात्र विरोध, भ्रम और जिम्मेदारी किसकी

दिग्विजय सिंह के अनुसार, मौजूदा विरोध मुख्य रूप से जनरल कैटेगरी के छात्रों द्वारा किया जा रहा है और इसके दो प्रमुख कारण हैं. पहला, ड्राफ्ट में मौजूद फर्जी शिकायतों पर दंड का प्रावधान अंतिम नियमों से हटाया जाना, और दूसरा, जातिगत भेदभाव के शिकार वर्गों की सूची में जनरल कैटेगरी का उल्लेख न होना.

उन्होंने साफ किया कि ये दोनों फैसले UGC ने अपने स्तर पर लिए, न कि संसदीय समिति की सिफारिशों के तहत. अंत में दिग्विजय सिंह ने कहा कि अब इस मुद्दे का समाधान UGC और शिक्षा मंत्रालय के हाथ में है, जिन्हें नियमों में स्पष्टता लाकर भरोसा बहाल करना होगा.