छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र के समापन के बाद प्रदेश में नक्सलवाद को लेकर सियासत एक बार फिर तेज हो गई है. पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नक्सलवाद के खात्मे का श्रेय अपनी सरकार की नीतियों को दिया, जबकि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा कि अगर पिछली सरकार ने प्रभावी कार्रवाई की होती तो प्रदेश में इतनी बड़ी संख्या में नक्सली नहीं बचे होते. इस दौरान रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बना.

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पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि उनकी सरकार के दौरान नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए. 600 गांवों को नक्सल प्रभाव से मुक्त कराया गया और बस्तर में विकास कार्यों के जरिए लोगों का विश्वास जीता गया.

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उन्होंने दावा किया कि कोंडागांव को नक्सल मुक्त घोषित किया गया था और नक्सली केवल बीजापुर व अबूझमाड़ के सीमित इलाकों तक सिमट गए थे.

रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर भी भूपेश बघेल ने सरकार को घेरते हुए कहा कि सरकार के पास ऐसे लोगों की संख्या का कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं है. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव के समय इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से उठाया जाता है.

सीएम विष्णु देव साय का कांग्रेस पर पलटवार

वहीं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कांग्रेस के दावों को खारिज करते हुए कहा कि डॉ. रमन सिंह के 15 साल के कार्यकाल में भी नक्सलवाद के खिलाफ मजबूती से लड़ाई लड़ी गई थी.

उन्होंने कहा कि वर्ष 2024 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की समीक्षा में यह सामने आया कि देश के अधिकांश सक्रिय नक्सली छत्तीसगढ़ में ही थे. मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि कांग्रेस सरकार ने प्रभावी ढंग से कार्रवाई की होती तो प्रदेश में नक्सलवाद इतनी बड़ी चुनौती बनकर नहीं रहता.

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राजनीति के केंद्र में फिर नक्सलवाद

नक्सलवाद को लेकर सत्ता और विपक्ष एक बार फिर आमने-सामने हैं. कांग्रेस अपनी सरकार के दौरान विकास, सुरक्षा कैंप और जनविश्वास को बड़ी उपलब्धि बता रही है, जबकि भाजपा का कहना है कि पिछली सरकार नक्सलवाद पर प्रभावी नियंत्रण करने में सफल नहीं रही. दोनों दल अपने-अपने कार्यकाल की उपलब्धियां गिना रहे हैं. ऐसे में साफ है कि नक्सलवाद का मुद्दा आने वाले दिनों में भी छत्तीसगढ़ की राजनीति का अहम विषय बना रहेगा.