बिहार की राजनीति में एक बार फिर हलचल है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की पुष्टि ने सियासी अटकलों को तेज कर दिया है. इसे सिर्फ दिल्ली की पारी नहीं माना जा रहा, बल्कि बिहार की सत्ता में संभावित बदलाव से जोड़कर देखा जा रहा है.

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नवंबर 2025 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने शुरुआत में कहा था कि मुख्यमंत्री का फैसला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए की बैठक में होगा. तब पार्टी ने अपना रुख खुला रखा था. बाद में चुनावी गणित को देखते हुए बीजेपी ने नीतीश कुमार को ही गठबंधन का चेहरा घोषित किया. अब अगर वही नीतीश राज्यसभा की ओर बढ़ते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आगे की रणनीति क्या है.

जनता दल यूनाइटेड, यानी जेडीयू फिलहाल 85 सीटों के साथ मजबूत स्थिति में है. ऐसे में अब जब नेतृत्व बदलेगा है तो यह सिर्फ पद का बदलाव नहीं होगा, बल्कि गठबंधन के भीतर ताकत के संतुलन पर भी असर डालेगा. बीजेपी लंबे समय से बिहार में अपने संगठन को मजबूत करने पर काम कर रही है, इसलिए बदलाव की चर्चा उसी नजर से भी की जा रही है.

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Nitish Kumar सिर्फ राज्यसभा सांसद रहेंगे या...?

एक और बड़ा सवाल यह है कि नीतीश कुमार की भूमिका क्या होगी. क्या वे सिर्फ राज्यसभा सांसद रहेंगे या केंद्र सरकार में मंत्री भी बन सकते हैं? अगर उन्हें दिल्ली में जिम्मेदारी मिलती है, तो यह उनकी सक्रिय राष्ट्रीय भूमिका का संकेत होगा.

सामाजिक समीकरण भी अहम हैं. नीतीश कुमार कुर्मी (OBC) समुदाय से आते हैं. कुर्मी वोटर संख्या में बहुत बड़े नहीं हैं, लेकिन राजनीति में उनकी पकड़ मानी जाती है. इसके अलावा अति पिछड़ा वर्ग, महादलित और महिला मतदाताओं में भी नीतीश की पकड़ रही है. अगर वे राज्य की सक्रिय राजनीति से दूर होते हैं, तो इन वर्गों का रुख किस ओर जाएगा, यह देखने वाली बात होगी.

इसी बीच उनके बेटे निशांत कुमार की एंट्री को लेकर भी चर्चा है. वह जदयू में शामिल होंगे. माना जा रहा है कि अब जब नीतीश  राज्यसभा जा रहे हैं तो निशांत, बिहार सरकार में मंत्री या जदयू संगठन में अहम पद संभाल सकते हैं. मंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा, 'निशांत के पार्टी में आने को लेकर काफी बात हो रही है. पार्टी में हर कोई चाहता है कि वे राजनीति में आएं.'

अब सवाल यह है कि क्या ये नीतीश कुमार का एग्जिट प्लान है, या दिल्ली में नई भूमिका की तैयारी? क्या बिहार में नई पीढ़ी को आगे लाने की पटकथा लिखी जा रही है? फिलहाल जवाबों से ज्यादा सवाल हैं-और बिहार की राजनीति में अक्सर असली कहानी आखिरी मोड़ पर ही साफ होती है.