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नीतीश का जाना तय! क्यों कोई ‘खेला’ मुमकिन नहीं, RJD भी खतरे में, आंकड़े बीजेपी के पक्ष में- जानिए कैसे?

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, राज्यसभा जा रहे हैं. उनके राज्यसभा जाने से बिहार में सिर्फ CM नहीं बदलेगा बल्कि सियासत की तस्वीर में कई ऐसे बदलाव के आसार हैं जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की रही होगी.

बिहार में जब जनता ‘बुरा न मानो होली है’ के साथ रंगों का त्योहार पूरे जोश के साथ मना रही थी, तभी सूबे की सियासत में बड़ा खेल चल रहा था. करीब 20 साल तक राज्य के सियाह-ओ-सफेद के मालिक रहे नीतीश कुमार को राजनीति के आखिरी स्टेशन की ओर भेजने की तैयारी चल रही थी और होली के दूसरे दिन इसे बड़ी खूबी से अंजाम दे दिया गया. खुद नीतीश कुमार से यह कहलवा दिया गया कि वे राज्यसभा जाना चाहते हैं और कुछ ही घंटों में वे नामांकन करते भी दिखे.

नीतीश के इस एग्जिट प्लान के बीच एक खबर विपक्ष और विरोधियों के लिए उम्मीद की तरह आई कि अगले एक महीने तक नीतीश कुमार सीएम बने रहेंगे. उनके समर्थकों और बीजेपी विरोधियों को लगता है कि खेला करने में माहिर नीतीश कुमार अगले एक महीने में कोई बड़ा दांव चल सकते हैं और इस तरह बीजेपी का कथित साइलेंट ऑपरेशन लोटस फेल हो सकता है. लेकिन आंकड़े और सूबे की मौजूदा सियासत इस तरह के खेल के लिए अनुकूल माहौल नहीं दिखा रहे हैं. बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कहीं यह खेल उल्टा RJD को ही मुश्किल में न डाल दे.

दरअसल, बिहार में चल रहे इस कथित साइलेंट ऑपरेशन लोटस के पीछे अमित शाह की रणनीति मानी जा रही है. मौजूदा सियासी हालात में ऐसा दिख भी रहा है कि बीजेपी को ज्यादा मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ेगा. इसकी वजह भी साफ बताई जा रही है.

बिहार की राजनीति में यह बात आम तौर पर कही जाती है कि जेडीयू के भीतर दो बड़े गुट हैं, जिनमें से एक गुट बीजेपी के काफी करीब माना जाता है और उसी के इशारे पर काम करता है. यहां तक कहा जाता है कि कुछ नेता जेडीयू में रहते हुए भी बीजेपी की लाइन पर चलते हैं. इसी तरह यह भी चर्चा है कि RJD के कई विधायक भी सत्ताधारी खेमे के संपर्क में हैं और किसी वक्त बगावत कर सकते हैं. जब कोई पार्टी केंद्र की सत्ता में होती है तो दूसरे दलों में टूट-फूट कराने या नेताओं को अपने साथ मिलाने की उसकी क्षमता ज्यादा मानी जाती है, और बिहार की राजनीति भी इससे अछूती नहीं मानी जा रही.

बिहार विधानसभा का गणित

बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं. बीजेपी के पास 89 सीटें हैं, जबकि जेडीयू के पास 85 सीटें हैं. अन्य सहयोगी दलों में एलजेपी के 19, हम के 5 और आरएलएम के 4 विधायक हैं. इस तरह एनडीए खेमे की कुल संख्या 202 सीटों तक पहुंचती है.

दूसरी ओर RJD के पास 25 सीटें हैं. कांग्रेस के 6, AIMIM के 5, लेफ्ट के 3, IIP के 1 और BSP के 1 विधायक हैं. अगर इन सभी को एक साथ जोड़ दिया जाए तो कुल संख्या 41 सीटें होती है. हालांकि, RJD, कांग्रेस, लेफ्ट और IIP ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और इनकी कुल सीटें 35 थीं.

आंकड़ों का खेल

अगर मान लिया जाए कि जेडीयू एनडीए से अलग हो जाता है, तो महागठबंधन के विधायकों की संख्या 202 में से 85 घटाकर 117 रह जाएगी. जबकि सरकार बनाने के लिए 122 का आंकड़ा चाहिए. कागज पर देखने पर लगता है कि यहां खेला संभव है, लेकिन सियासी हकीकत कुछ और हो सकती है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी RJD, जेडीयू और कांग्रेस में टूट-फूट करा सकती है. AIMIM में भी सियासी खेल संभव माना जा रहा है. BSP और IIP का झुकाव भी बीजेपी की ओर जा सकता है. ऐसे में माना जा रहा है कि सिर्फ सीपीएम के तीन विधायक ही इस पूरी उठापटक से दूर रह सकते हैं. इसलिए कई विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश चाहे जितना समय लें, किसी बड़े ‘खेला’ को अंजाम देना उनके लिए आसान नहीं होगा.

अब्दुल वाहिद आज़ाद

अब्दुल वाहिद आज़ाद इस वक़्त abp न्यूज़ में बतौर एडिटर (एबीपी लाइव- हिंदी) अपनी सेवाएं दे रहे हैं. आज़ाद abp न्यूज़ के डिजिटल विंग में बीते 15 साल से हिंदी वेबसाइट की जिम्मेदारी संभाले रहे हैं. इससे पहले वे बीबीसी उर्दू और हिंदी में अपनी सेवाएं दे चुके हैं और साढ़े तीन साल तक उनका जुड़ाव बीबीसी से रहा. इस दौरान उन्होंने रिपोर्टिंग से लेकर खबरों के संपादन के काम को बखू़बी अंजाम दिया. अब्दुल वाहिद आज़ाद ने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत हिंदुस्तान एक्सप्रेस अखबार में बतौर कॉरेस्पोंडेंट की. पांच महीने की इस छोटी सी पारी में उन्हें बीजेपी और कांग्रेस पार्टी की बीट दी गई थी. बाजापता तौर पर पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया (केंद्रीय विश्वविद्यालय) के हिंदी विभाग से मास मीडिया में स्नातक और देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान MCRC से कनवर्जेंट जर्नलिज्म का कोर्स किया. आज़ाद राजनीति, चुनाव, समाज, मुस्लिम, भेदभाव, उत्पीड़न जैसे संजीदा मसलों के हल में रुचि रखते हैं और इन मुद्दों पर लगातार लिखते रहते हैं. अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति पर भी उनकी पैनी नज़र है.

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