बिहार में नया सीएम कौन होगा, इस पर अब चर्चाओं और अटकलों को विराम मिल चुका है. भारतीय जनता पार्टी के विधायक दल की बैठक में सम्राट चौधरी के नाम पर मुहर लग गई. इससे पहले जब कार्यवाहक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा में नामांकन के बाद राज्य की यात्रा पर निकले, तो वह कई मौकों पर यह संकेत देते रहे कि सम्राट ही राज्य के अगले सीएम होंगे.

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बीते एक दशक से ज्यादा समय में बीजेपी की कार्यशैली से वाकिफ राजनीतिक पंडित इन इशारों को सिर्फ इशारा ही मानकर चल रहे थे. सबके जेहन में यह बात थी कि बीजेपी इस तरह किसी ऐलान या संकेत भर के दम पर सीएम नहीं चुनेगी.

हालांकि, इस बार उलटा हुआ. केंद्र और विभिन्न राज्यों की सत्ता में मौजूद बीजेपी ने शायद पहली बार ऐसा फैसला लिया, जिसकी जानकारी लगभग सबको पहले से थी. बिहार के राजनीतिक घटनाक्रम से वाकिफ सूत्रों का दावा है कि बीजेपी यहां मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ या उत्तर प्रदेश जैसा कोई बड़ा और अप्रत्याशित फैसला लेने से बची.

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सबने कहा- मार्गदर्शक नीतीश

सूत्रों के मुताबिक, जैसे ही नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की बात स्पष्ट हुई, उसके बाद से बीजेपी, जनता दल (यूनाइटेड) समेत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के हर दल की ओर से यह कहा जाने लगा कि अगली सरकार जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष के मार्गदर्शन में ही चलेगी.

अपनी यात्रा के दौरान अलग-अलग मौकों पर सम्राट चौधरी का नाम लेकर या उनकी पीठ थपथपाकर नीतीश कुमार, एनडीए-खासतौर पर बीजेपी को यह संकेत दे चुके थे कि उनकी इच्छा क्या है. ऐसे में केंद्र में सत्तारूढ़ दल ने भी कोई अलग फैसला करना उचित नहीं समझा.

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नीतीश कुमार ने अपनी यात्रा के दौरान न केवल सम्राट का नाम लिया या इशारा किया, बल्कि जेडीयू कार्यकर्ताओं तक भी यह संदेश पहुंचाया कि वह जिसे चाहेंगे, वही सीएम होगा. अब सम्राट के नाम पर मुहर लगने से यह बात और स्पष्ट हो गई है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सम्राट को सीएम बनाने के फैसले से राज्य में जेडीयू और बीजेपी के बीच, नीतीश कुमार की अप्रत्यक्ष गैरमौजूदगी के बावजूद, दूरी नहीं बढ़ेगी.

नीतीश को नाराज नहीं करना चाहती थी बीजेपी

बीजेपी किसी भी कीमत पर नीतीश कुमार को नाराज नहीं करना चाहती थी. इसके पीछे सिर्फ यह वजह नहीं थी कि वे सम्राट चौधरी को पसंद करते थे, बल्कि जेडीयू का एक बड़ा धड़ा नीतीश कुमार के दिल्ली जाने को बीजेपी की साजिश से जोड़कर देख रहा था. इसमें कुछ विधायक भी शामिल थे. ऐसे में बीजेपी ने जेडीयू के साथ संतुलन बनाकर चलने की रणनीति अपनाई.

इस्तीफा देने से पहले बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने आखिरी बयान में भी कहा, 'नई सरकार को मेरा पूरा सहयोग एवं मार्गदर्शन रहेगा.'

विपक्ष के बयान भी अहम कारण?

बीजेपी द्वारा राज्य में कोई बड़ा प्रयोग न करने के पीछे विपक्षी दलों का दबाव भी एक अहम कारण माना जा रहा है. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, भले ही राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल विधानसभा के संख्याबल में कमजोर हों, लेकिन नीतीश कुमार के हालिया इस्तीफे ने राज्य की बड़ी आबादी के बीच यह धारणा बना दी है कि तेजस्वी यादव समेत विपक्षी नेताओं के दावे सही साबित हो रहे हैं.

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ऐसे में बीजेपी भी किसी ऐसे चेहरे को सीएम बनाने से बचना चाहती थी, जिससे विपक्ष के दावों को और बल मिले. गौरतलब है कि जब नए सीएम को लेकर चर्चाएं चल रही थीं, उस दौरान विपक्ष के कई नेताओं ने “पर्ची” का जिक्र किया था. वे भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाए जाने के समय पूर्व सीएम वसुंधरा राजे सिंधिया के हाथ में थमाई गई पर्ची का उदाहरण देते हुए इसी तरह की स्थिति की आशंका जता रहे थे.

दूसरी ओर, बीजेपी भी चाहती है कि वह पहले बिहार में अपनी संगठनात्मक और राजनीतिक जमीन को और मजबूत कर ले, ताकि भविष्य में गठबंधन के साथियों के संकेतों या दबावों से इतर फैसले लेने की स्थिति में आ सके.