बिहार में आरक्षण के मुद्दे पर एनडीए के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं. लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के आरक्षण में बदलाव के विरोध के बाद हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के अध्यक्ष संतोष सुमन ने उन्हें तीखा जवाब दिया है. दोनों नेताओं के बीच ‘कोटे में कोटा’ और एससी/एसटी आरक्षण के उप-वर्गीकरण को लेकर जुबानी जंग तेज हो गई है.
संतोष सुमन ने स्पष्ट किया कि वह एससी/एसटी आरक्षण खत्म करने या क्रीमी लेयर लागू करने की मांग नहीं कर रहे हैं. उनका कहना है कि एससी/एसटी वर्ग के भीतर उप-वर्गीकरण के जरिए उन समुदायों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाया जाना चाहिए, जो दशकों बाद भी सबसे पीछे हैं. उन्होंने मुसहर, भुइयां, हलखोर, नट और डोम जैसे समुदायों का जिक्र करते हुए कहा कि इन वर्गों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति आज भी बेहद कमजोर है.
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चिराग के ‘इस्तीफे’ वाले रुख पर पलटवार
संतोष सुमन ने चिराग पासवान को संबोधित करते हुए कहा कि अगर इस्तीफे की बात आती है तो वह इसके लिए तैयार हैं. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि चिराग उनके ‘छोटे भाई’ हैं, उनकी पार्टी बड़ी है और उनके पास ज्यादा संख्याबल है, इसलिए शुरुआत उन्हें करनी चाहिए. सुमन ने कहा कि वह भी उनके साथ इस्तीफा देने को तैयार हैं. साथ ही उन्होंने चिराग से आग्रह किया कि उनके ट्वीट और बयान को पूरी तरह पढ़कर ही प्रतिक्रिया दें.
‘कोटे में कोटा और क्रीमी लेयर अलग मुद्दे’
संतोष सुमन ने कहा कि ‘कोटे में कोटा’ और ‘क्रीमी लेयर’ दो अलग-अलग विषय हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि दोनों मुद्दों को एक साथ जोड़कर जनता को भ्रमित किया जा रहा है. उनके मुताबिक, उनकी मांग किसी जाति या समुदाय का अधिकार छीनने की नहीं, बल्कि आरक्षित वर्ग के भीतर सबसे वंचित लोगों के लिए हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी परिवार में कुछ लोग पूरी थाली अपने सामने खींच लें और बाकी लोग पीछे रह जाएं, तो वंचित लोगों के हिस्से की बात करना गलत नहीं है.
‘आंकड़ों के आधार पर हो आरक्षण की समीक्षा’
संतोष सुमन ने कहा कि इस मुद्दे पर डर और भ्रम के बजाय तथ्यों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए. उनका कहना है कि सामाजिक न्याय की व्यवस्था का उद्देश्य सबसे पीछे खड़े व्यक्ति को आगे आने का अवसर देना है. उन्होंने कहा कि आरक्षण की व्यवस्था की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए आंकड़ों के आधार पर समीक्षा होनी चाहिए. साथ ही उन्होंने राजनीतिक बयानबाजी से बाहर निकलकर गरीब और वंचित समुदायों की वास्तविक स्थिति देखने की अपील की.
वहीं, चिराग पासवान पहले ही कह चुके हैं कि आरक्षण की समीक्षा और ‘आरक्षण के अंदर आरक्षण’ की व्यवस्था स्वीकार्य नहीं है. ऐसे में एनडीए के दो प्रमुख सहयोगी दलों के नेताओं के बीच यह विवाद बिहार की राजनीति में आने वाले दिनों में और गर्म हो सकता है.
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