बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का परिणाम आरजेडी के लिए किसी झटके से कम नहीं है. तेजस्वी यादव के नेतृत्व में 143 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी को केवल 25 सीटों पर जीत मिली है. यह न सिर्फ 2020 के मुकाबले बड़ा पतन है, बल्कि बिहार चुनावों में आरजेडी का दूसरा सबसे खराब प्रदर्शन भी है.

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जानकारी के अनुसार, आरजेडी अब सत्ता से कोसों दूर है और एनडीए एक बार फिर सरकार बनाता दिख रहा है. तेजस्वी यादव और आरजेडी के लिए यह चुनावी नतीजा न सिर्फ हार है, बल्कि आने वाले समय के लिए एक गहरी सीख भी है.

2020 की सबसे बड़ी पार्टी से 2025 की करारी हार तक

2020 के चुनावों में आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन इस बार उसका प्रदर्शन पूरी तरह धराशायी होता दिखा. यह गिरावट उस दौर की याद दिलाती है जब 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए ने भारी जीत दर्ज की थी और आरजेडी केवल 55 सीटों पर सिमट गई थी. उस समय राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं और राज्य में एंटी-इनकंबेंसी चरम पर थी.

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2010 के बाद आरजेडी का सबसे खराब प्रदर्शन

2010 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी ने अपने इतिहास का सबसे खराब प्रदर्शन किया था, जब वह केवल 22 सीटें जीत पाई थी. इस बार 25 सीटों के साथ आरजेडी का प्रदर्शन उस रिकॉर्ड के थोड़ा ही ऊपर है, जो पार्टी के लिए एक बड़ी राजनीतिक चेतावनी है.

बिहार में एनडीए की भारी वापसी

बीते बीस वर्षों में कई राजनीतिक उतार–चढ़ाव, गठबंधनों में बदलाव और नीतीश कुमार के लगातार 'फ्लिप-फ्लॉप' के बावजूद, 2025 के चुनाव में बीजेपी–जेडीयू गठबंधन ने 243 में से 202 सीटें जीतकर जबरदस्त वापसी की है. यह नतीजे दिखाते हैं कि एनडीए के सामने आरजेडी बहुत पीछे रह गई है.

वोट शेयर में आगे लेकिन सीटों में पीछे

दिलचस्प बात यह है कि हार के बावजूद आरजेडी का वोट शेयर सभी दलों में सबसे अधिक रहा है. इसका मतलब यह है कि पार्टी ने कुछ सीटों पर बड़े अंतर से जीत दर्ज की, लेकिन जिन सीटों पर करीबी मुकाबला था, वहां वह जीत को सीटों में बदलने में नाकाम रही. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, रणनीतिक कमजोरियां और विरोधी वोटों का एकत्र होना आरजेडी की हार की बड़ी वजहें हैं.

तेजस्वी यादव के लिए बड़ी चुनौती

36 वर्षीय तेजस्वी यादव के लिए यह चुनावी नतीजा एक कठिन राजनीतिक परीक्षा है. वे पार्टी संस्थापक लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक विरासत संभाल रहे हैं, लेकिन 2025 के परिणाम बताते हैं कि आरजेडी को अपने संगठन, बोथ मैनेजमेंट और रणनीति को फिर से मजबूत करने की जरूरत है.

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