कांग्रेस नेतृत्व कर्नाटक की उलझन में फंसा हुआ है, जबकि बिहार में भी पार्टी का हाल बुरा होता जा रहा है. संकेत मिल रहे हैं कि बिहार में भी कांग्रेस को उतनी ही विधानसभा सीटें मिल सकती हैं, जितनी पश्चिम बंगाल में हैं- यानी शून्य. 

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दरअसल, यह बात सामने आ रही है कि बिहार के सभी 6 कांग्रेस विधायक जल्द ही नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू में शामिल हो सकते हैं. ग्राउंड पर चल रही खबरों से ऐसे संकेत मिल रहे हैं. हालांकि कांग्रेस नेता इन अफवाहों का खंडन कर रहे हैं.

बिहार में पहले से ही कमजोर विपक्ष, लगेगी और बड़ा झटका

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कांग्रेस के कार्यक्रमों में बिहार विधायकों की गैर-मौजूदगी और सत्ताधारी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (NDA) की ओर से किए गए प्रस्तावों ने इस बात को और हवा दी है कि पहले से ही कमजोर विपक्ष को और भी बड़ा झटका लग सकता है.

पिछले हफ्ते तीन कांग्रेस विधायकों के एक महत्वपूर्ण पार्टी बैठक में अनुपस्थित रहने के बाद अटकलों को और बल मिला, जबकि मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर राज्य कांग्रेस इकाई द्वारा आयोजित पारंपरिक 'दही-चूड़ा' भोज में इन 6 में से कोई भी विधायक शामिल नहीं हुआ.

चिराग पासवान के नेता का दावा, NDA के संपर्क में कांग्रेस विधायक

खबरों के मुताबिक, सत्ताधारी जनता दल-यूनाइटेड के नेता कांग्रेस विधायकों के संपर्क में हैं और जल्द ही दल-बदल की घोषणा की जा सकती है. अफवाहों को और हवा देते हुए, लोक जनशक्ति पार्टी-राम विलास के नेता संजय कुमार ने दावा किया कि कांग्रेस के सभी 6 विधायक सत्तारूढ़ NDA के संपर्क में हैं और मकर संक्रांति (बुधवार को मनाई गई) के बाद दल बदल लेंगे.

यह अटकलें एनडीए की बिहार विधानसभा चुनावों में शानदार जीत के ठीक दो महीने बाद सामने आई हैं, जहां उसने 243 में से 202 सीटें जीतकर विपक्षी महागठबंधन को बुरी तरह से पस्त कर दिया था. विश्लेषण तीन संभावित परिणामों की ओर इशारा करते हैं. 

बिहार में कांग्रेस का सियासी पतन? 

पहला मामला यह है कि सभी 6 विधायक दल बदल लें, जिससे कांग्रेस का विधानसभा में अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और बिहार में उसका प्रतीकात्मक पतन हो जाएगा. इसके अलावा, आंशिक दल बदल की भी संभावना है, जो दल बदल विरोधी नियमों के तहत आधिकारिक विभाजन को ट्रिगर करने के लिए पर्याप्त होगा, जिससे कांग्रेस कमजोर तो होगी लेकिन पूरी तरह से खत्म नहीं होगी.

हालांकि, पुष्टि के अभाव में, यथास्थिति बने रहने की भी संभावना है, जहां विधायक बने रहेंगे, लेकिन लगातार अटकलें पार्टी की विश्वसनीयता को और कमजोर करेंगी. किसी भी परिस्थिति में, महागठबंधन का विपक्षी गुट, जो विधानसभा चुनाव में पहले ही हाशिए पर चला गया है, अब और भी कमजोर हो जाएगा.