IPL 2026 खत्म हुए कुछ हफ्ते ही बीते हैं, लेकिन इस सीजन की सबसे बड़ी सनसनी को लेकर एक नई और अनोखी बहस शुरू हो चुकी है. राजस्थान रॉयल्स के लिए खेलने वाले 15 साल के वैभव सूर्यवंशी ने 72 छक्कों की बरसात करके पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा है. लेकिन इस बार बात सिर्फ क्रिकेट के मैदान तक सीमित नहीं है. देश के टॉप मैनेजमेंट कॉलेज IIM इंदौर ने ऐलान किया है कि वो वैभव की जिंदगी और खेल को एक केस स्टडी के तौर पर पढ़ेगा. इस स्टडी का नाम रखा गया है- 'वैभव सूर्यवंशी: माइंडसेट एंड मैनेजमेंट'. अब सवाल ये है कि एक मैनेजमेंट संस्थान को एक क्रिकेटर से इतनी दिलचस्पी क्यों हो गई और इस स्टडी में होगा क्या?

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IPL 2026 का वो तूफान जिसने सबको हिला कर रख दिया  

सबसे पहले समझते हैं कि IIM इंदौर की नजर वैभव पर पड़ी क्यों. इसके लिए हमें IPL 2026 के उन आंकड़ों को देखना होगा, जिन्होंने क्रिकेट की दुनिया का हर रिकॉर्ड तोड़ दिया. वैभव ने पूरे टूर्नामेंट में 17 मैच खेले और 700 से ज्यादा रन बनाकर ऑरेंज कैप अपने नाम की. लेकिन असली कमाल तो उनके 72 छक्कों का था, जो IPL के किसी भी सीजन में अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है. यानी हर मैच में औसतन 4 से ज्यादा छक्के. 

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वैभव का स्ट्राइक रेट 200 के पार रहा और गेंदबाजों के लिए वो किसी पहेली से कम नहीं थे. खास बात ये थी कि उनकी ये ताबड़तोड़ बल्लेबाजी सिर्फ एक-दो मैचों तक सीमित नहीं थी, बल्कि पूरे दो महीने के ग्रुएलिंग शेड्यूल में लगातार बनी रही. जब कोई 15 साल का खिलाड़ी दुनिया के सबसे बड़े T20 लीग में इस कदर छा जाता है, तो सिर्फ उसकी तकनीक नहीं, बल्कि उसका दिमागी ढांचा भी सवालों के घेरे में आता है.

कौन है वैभव सूर्यवंशी? जमीन से उठकर आसमान छूने की अनकही दास्तां

अब जरा उस बैकग्राउंड को समझते हैं, जो इस पूरी कहानी को और भी चौंकाने वाला बनाता है. वैभव बिहार के समस्तीपुर से आते हैं. उनके पिता किसान हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद साधारण रही है. क्रिकेट से जुड़ने का कोई फैमिली बैकग्राउंड नहीं था, न ही कोई बड़ी अकादमी का सपोर्ट. जो भी क्रिकेट सीखी, वो गांव की गलियों और स्कूल के मैदानों में सीखी. पहले लकड़ी के बल्ले से खेलना, फिर धीरे-धीरे जिला स्तर के टूर्नामेंट.

राजस्थान रॉयल्स के स्काउट्स की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने उन्हें 1.10 करोड़ रुपये की बोली लगाकर अपनी टीम से जोड़ लिया. लेकिन यहां से असली परीक्षा शुरू हुई. एक अनजान लड़का, जिसने कभी बड़े स्टेडियम का माहौल नहीं देखा था, अचानक करोड़ों दर्शकों के सामने खेलने वाला था. IIM इंदौर की दिलचस्पी ठीक इसी पॉइंट पर शुरू होती है कि कैसे एक इंसान बिना किसी खास संसाधन के, एक ऐसे मंच पर पहुंचकर अपना बेहतरीन प्रदर्शन देता है.

IIM इंदौर का असली मकसद- सिर्फ क्रिकेट नहीं, माइंडसेट का एक्स-रे

IIM इंदौर के प्रोफ़ेसर चंदन परसाई और उनकी टीम का साफ कहना है कि वैभव की कहानी एक परफेक्ट 'बिजनेस केस स्टडी' की तरह है. वो इसे एक स्टार्टअप की तरह देख रहे हैं. एक छोटी सी जगह से उठकर, बिना बड़े फंडिंग या बैकअप के, महज अपनी मानसिक मजबूती और सही रणनीति के दम पर मार्केट लीडर बन जाना. स्टडी को तीन बड़े हिस्सों में बांटा गया है.

  • दबाव में निर्णय लेने की क्षमता
  • असफलता से उबरने का सिस्टम
  • लगातार बेहतर होते जाने का सेल्फ-डिजाइन किया गया फॉर्मूला

प्रोफेसर परसाई के मुताबिक, जब कोई CEO किसी बड़ी कंपनी को लगातार मुनाफे में ले जाता है, तो हम उसके पीछे के माइंडसेट को समझना चाहते हैं. वैभव के साथ भी यही हो रहा है. सवाल ये हैं कि वो डेथ ओवर्स में, जब पूरा स्टेडियम शोर मचा रहा होता है और मैच का नतीजा उसकी बल्लेबाजी पर टिका होता है, अपना दिमाग कैसे शांत रखता है?

जब वो लगातार दो मैचों में शून्य पर आउट होता है, तो अगले मैच में फिर से छक्के कैसे जड़ने लगता है? और सबसे बड़ी बात- 15 साल की उम्र में वो अनुशासन कहां से आता है, जो उसे सोशल मीडिया, पार्टियों और तमाम तरह के डिस्ट्रैक्शन से दूर रखता है? ये सब सवाल किसी मैनेजमेंट स्टूडेंट के लिए उतने ही जरूरी हैं, जितने किसी स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट के लिए.

माइंडसेट का स्कैन और मैनेजमेंट की लेयर- कैसे होगी ये स्टडी?  

ये स्टडी सिर्फ कागजी या थ्योरी बेस्ड नहीं होगी. IIM इंदौर की रिसर्च टीम इसके लिए एक पूरा वैज्ञानिक तरीका अपनाएगी:

  • वैभव के साथ लंबे और स्ट्रक्चर्ड इंटरव्यू होंगे, जहां उनसे उनके डर, उनकी तैयारी के तरीके और मैच के दौरान चलने वाली सोच पर बात की जाएगी.
  • उनके बचपन के कोच, परिवार के लोग और राजस्थान रॉयल्स के सपोर्ट स्टाफ (जैसे टीम मेंटर और स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट) से भी डिटेल्ड बातचीत होगी.
  • ये इसलिए जरूरी है ताकि ये समझा जा सके कि वैभव के आसपास का 'इको-सिस्टम' कैसे काम करता है, जो उसे मानसिक तौर पर इतना मजबूत बनाता है.
  • सबसे अहम हिस्सा होगा मैच रिकॉर्डिंग का एनालिसिस. रिसर्च टीम उन मौकों की बारीकी से जांच करेगी जब वैभव पर सबसे ज्यादा दबाव था- जैसे सेमीफाइनल के आखिरी ओवर, या जब उनकी टीम ने शुरुआती विकेट जल्दी खो दिए थे.
  • वो देखेंगे कि उन्होंने किस गेंद पर क्या शॉट खेला, उनकी बॉडी लैंग्वेज क्या थी और गलती होने पर उन्होंने खुद को कैसे संभाला.
  • इस पूरी प्रक्रिया को IIM इंदौर ने 'माइंडसेट का स्कैन' नाम दिया है, जो दरअसल एक हाई-लेवल साइकोलॉजिकल और मैनेजीरियल ऑडिट है.

15 साल की उम्र में 'सिक्सर किंग' बनने का राज

अब जरा उन डिटेल्स पर नजर डालते हैं जो इस स्टडी में काम आएंगी. रिपोर्ट्स के मुताबिक, वैभव का डेली रूटीन किसी आर्मी ऑफिसर से कम नहीं है. वो सुबह 4 बजे उठते हैं, करीब एक घंटा योग और मेडिटेशन करते हैं, जिसके बाद करीब 6 घंटे का नेट सेशन होता है. उनकी डाइट पूरी तरह से मापी-तौली होती है, जिसमें प्रोटीन और हाइड्रेशन का विशेष ध्यान रखा जाता है. लेकिन असली बात ये है कि वो सोशल मीडिया से लगभग पूरी तरह कटे रहते हैं.

वैभव का फोन उनके पिता या कोच के पास रहता है और वो खुद सिर्फ मैच की तैयारी और रिकवरी पर ध्यान देते हैं. IIM इंदौर के लिए ये 'सेल्फ-मैनेजमेंट' का एक बेहतरीन उदाहरण है. स्टडी में ये समझने की कोशिश होगी कि क्या ये अनुशासन किसी बाहरी दबाव में आकर आया या ये उनके अंदर से निकली हुई ड्राइव का नतीजा है.

आखिर वैभव का मैनेजमेंट की पढ़ाई से क्या लेना-देना?

IIM इंदौर इस केस स्टडी को अपने लीडरशिप, स्ट्रेटेजी और ऑर्गनाइजेशनल बिहेवियर के कोर्सेज में शामिल करेगा. जब एक MBA स्टूडेंट इसे पढ़ेगा, तो वो ये सीखेगा कि किस तरह एक व्यक्ति ने, जिसके पास न कोई आइवी लीग की डिग्री थी, न कोई फैमिली बिजनेस का सपोर्ट, अपनी एक अलग 'ब्रांड वैल्यू' खड़ी की.

वैभव की कहानी सिखाती है कि दबाव को मैनेज करना, लगातार सीखते रहना और अपनी कमजोरियों पर काम करना, ये वो स्किल्स हैं जो सिर्फ क्रिकेट के मैदान पर नहीं, बल्कि किसी भी बोर्डरूम में सफलता की गारंटी हैं. प्रोफेसर परसाई का मानना है कि आने वाले समय में कॉरपोरेट वर्ल्ड में सफल होने के लिए जिस तरह के 'रिजिलिएंट माइंडसेट' की जरूरत होगी, वैभव उसका जीता-जागता मॉडल हैं.