भारतीय क्रिकेट में एक समय ऐसा था जब टीम इंडिया की जर्सी पहनना हर खिलाड़ी का सबसे बड़ा सपना माना जाता था. घरेलू क्रिकेट में वर्षों तक लगातार प्रदर्शन करने के बाद ही किसी खिलाड़ी को भारत की ओर से खेलने का मौका मिलता था. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह बहस लगातार तेज हुई है कि क्या अब भारतीय टीम की कैप पहले की तुलना में बहुत जल्दी खिलाड़ियों को दी जा रही है?

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अशोक शर्मा का डेब्यू 

ज़िम्बाब्वे के खिलाफ टी20 सीरीज़ में तेज़ गेंदबाज़ अशोक शर्मा को भारत की ओर से डेब्यू करने का मौका मिला. इसमें कोई दो राय नहीं कि उन्होंने घरेलू क्रिकेट और आईपीएल में अपनी प्रतिभा दिखाई है और डेब्यू उनके लिए गर्व का क्षण है. सवाल अशोक शर्मा की प्रतिभा पर नहीं है, बल्कि भारतीय चयन नीति पर है. अशोक ने डेब्यू करने से पहले सिर्फ 4 फर्स्ट क्लास और 8 लिस्ट ए मैच खेले हैं , वहीं उनके खाते में अब तक 17 T20 ही दर्ज हैं.

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तीनों फॉर्मेट में धड़ाधड़ मौके

-ज़िम्बाब्वे दौरे के लिए टीम में अशोक शर्मा के अलवा प्रभसिमरन सिंह और यश ठाकुर को भी मौक़ा दिया गया है. 

-इससे पहले वैभव सूर्यवंशी इंग्लैंड के ख़िलाफ़ टी20 डेब्यू कर चुके हैं 

-वहीं हर्ष दुबे को अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ वनडे में मौक़ा दिया जा चुका है 

-जबकि तेज़ गेंदबाज़ प्रिंस यादव और गुरनूर बरार भी अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ इंटरनेशनल डेब्यू कर चुके हैं 

-वहीं स्पिनर मानव सुथर को अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ टेस्ट में मौका दिया गया.

गावस्कर ने उठाए सवाल 

यही सवाल पूर्व भारतीय कप्तान सुनील गावस्कर भी उठा चुके हैं. उनका मानना है कि भारत की कैप का अपना एक अलग सम्मान और महत्व है. अगर लगातार रोटेशन और प्रयोग के नाम पर बहुत जल्दी खिलाड़ियों को डेब्यू कराया जाएगा, तो कहीं न कहीं उस कैप की अहमियत कम होने का खतरा पैदा हो सकता है.

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अश्विन ने जताई चिंता 

पूर्व भारतीय स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने भी इसी तरह की चिंता व्यक्त की थी. उनका कहना था कि अगर हर सीरीज़ में टीम पूरी तरह बदलती रहे और खिलाड़ियों को लगातार अंदर-बाहर किया जाए, तो इससे खिलाड़ियों में असुरक्षा की भावना भी पैदा होती है और भारतीय टीम की स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है.

बहस का दूसरा पक्ष 

हालांकि, इस बहस का दूसरा पक्ष भी है. आज भारतीय क्रिकेट में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है. आईपीएल, रणजी ट्रॉफी, विजय हज़ारे ट्रॉफी और सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी जैसे टूर्नामेंटों ने खिलाड़ियों का बड़ा पूल तैयार किया है. ऐसे में चयनकर्ताओं के सामने विकल्प पहले से कहीं ज़्यादा हैं. भविष्य की टीम तैयार करने और खिलाड़ियों के वर्कलोड को मैनेज करने के लिए नए चेहरों को मौका देना भी ज़रूरी माना जाता है.

लेकिन सवाल यही है कि क्या मौका देने और जल्दबाज़ी में डेब्यू कराने के बीच संतुलन बनाया जा रहा है? क्या खिलाड़ी घरेलू क्रिकेट में पर्याप्त समय बिताकर अपने खेल को पूरी तरह निखार रहे हैं, या फिर आईपीएल के कुछ शानदार प्रदर्शन ही टीम इंडिया का दरवाज़ा खोलने के लिए पर्याप्त हो गए हैं?

भारतीय टीम की कैप सिर्फ एक जर्सी नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों और देश का प्रतिनिधित्व करने का प्रतीक है, इसलिए चयनकर्ताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे भविष्य के सितारों को अवसर भी दें और साथ ही टीम इंडिया की कैप की प्रतिष्ठा भी बरकरार रखें.

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