Explained: FIFA वर्ल्ड कप का दुनियाभर में शोर लेकिन में भारत में सन्नाटा! भारतीयों के खून में क्यों दौड़ता क्रिकेट?
FIFA World Cup 2026: क्रिकेट के प्रशंसकों में नियमित रूप से मैच देखने वाले यानी 'एक्टिव फैन' बहुत ज्यादा हैं, जबकि फुटबॉल में अभी भी बड़ा हिस्सा यानी 'कैज़ुअल व्यूअर' सिर्फ बड़े टूर्नामेंट देखता है.

11 जून 2026 से अमेरिका, मैक्सिको और कनाडा की मेजबानी में फीफा वर्ल्ड कप का आगाज होने जा रहा है. पूरी दुनिया में इस वक्त सिर्फ फुटबॉल की बातें हो रही हैं, लेकिन भारत का नजारा कुछ और ही है. यहां इसी जून में वेस्टइंडीज और साउथ अफ्रीका के खिलाफ भारतीय क्रिकेट टीम की सीरीज को लेकर ज्यादा जुनून है. सवाल यह उठता है कि आखिर वह खेल, जिसके लिए ब्राजील से लेकर जर्मनी तक सड़कों पर उतर आते हैं, भारत के दिल पर राज करने में क्यों नाकाम रहा? और क्रिकेट ने हम पर ऐसा जादू कैसे कर दिया कि वो खून में घुल-सा गया?
भारत की फुटबॉल विरासत का शानदार इतिहास
अक्सर लगता है कि फुटबॉल तो भारत में कभी आया ही नहीं, जबकि सच्चाई यह है कि देश की फुटबॉल कहानी बहुत पुरानी और सुनहरी रही है. 1911 की भारतीय फुटबॉल संघ (IFA) शील्ड के फाइनल में नंगे पैर खेल रही मोहन बागान की टीम ने ब्रिटिश ईस्ट यॉर्कशायर रेजिमेंट को हराकर वो कर दिखाया जो आजादी की लड़ाई का एक अहम मनोवैज्ञानिक पड़ाव बना. 1950 के फीफा वर्ल्ड कप के लिए भारतीय टीम ने क्वालिफाई भी कर लिया था, लेकिन जूते पहनने की मजबूरी और दूसरी वजहों से टीम वापस ले ली गई.
1951 और 1962 के एशियाई खेलों में भारत ने फुटबॉल में गोल्ड मेडल जीता और 1956 के मेलबर्न ओलंपिक में चौथा स्थान हासिल किया. मोहन बागान, ईस्ट बंगाल और हैदराबाद सिटी पुलिस जैसी टीमों के मैच देखने लाखों की भीड़ उमड़ती थी. यानी फुटबॉल की जड़ें भारत की मिट्टी में बहुत गहरी थीं.
1983 की वो ऐतिहासिक जीत, जिसने पूरा खेल ही बदल दिया
25 जून 1983 को लंदन में लॉर्ड्स का मैदान... कपिल देव की कप्तानी में भारतीय टीम ने वेस्टइंडीज जैसी दिग्गज टीम को हराकर क्रिकेट वर्ल्ड कप अपने नाम कर लिया. यह सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं थी, यह पूरे देश के आत्मविश्वास की जीत थी. BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, इसी जीत ने भारत के मिडिल क्लास लोगों को यह अहसास कराया कि वो दुनिया में किसी से कम नहीं है. उस वक्त देश में टेलीविजन का प्रसार तेजी से हो रहा था और 1982 के एशियाई खेलों के बाद रंगीन टीवी घर-घर पहुंचने लगा था.
इस जीत को बार-बार दिखाया गया और उसके बाद 1985 में ऑस्ट्रेलिया में हुई वर्ल्ड चैंपियनशिप ऑफ क्रिकेट में भारत की जीत ने क्रिकेटरों को रातों-रात भगवान का दर्जा दे दिया. दूसरी तरफ, फुटबॉल का स्वर्ण युग धीरे-धीरे ढलान पर जा रहा था. बुनियादी ढांचे की कमी, क्लब मैनेजमेंट की अंदरूनी राजनीति और एक ऐसा बड़ा पल न मिलना जो पूरे देश को एक साथ जोश से भर दे, ये सब फुटबॉल को पीछे धकेलने लगे.
फुटबॉल ग्राउंड और पैसों की कमी आज भी बरकरार
अब जरा अपने आस-पास नजर दौड़ाइए. हर गली-मोहल्ले में क्रिकेट का कोई न कोई जुगाड़ वाला स्टेडियम आपको मिल जाएगा. तीन ईंटों की विकेट, एक बल्ला और एक टेनिस बॉल, बस खेल शुरू. लेकिन एक फुटबॉल ग्राउंड के लिए आपको शहर के बड़े पार्क या स्टेडियम तक का सफर करना पड़ता है. एक बच्चे के रूप में हम जिस खेल को आसानी से रोज खेल पाते हैं, उसी से प्यार हो जाता है. क्रिकेट ने यह जगह बखूबी भरी.
इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट बताती है कि भारतीय फुटबॉल लीग उस लेवल का रोमांच और स्टार पावर पैदा नहीं कर पाईं, जो इंटरनेशनल फुटबॉल टूर्नामेंट देते हैं. इंडियन सुपर लीग (ISL) के आने से हालात थोड़े सुधरे हैं, लेकिन अभी भी जमीनी स्तर पर कोई बड़ा सिस्टम नहीं बन पाया है.
द टेलीग्राफ इंडिया के आर्टिकल के मुताबिक, एक वक्त था जब कोलकाता के मैदानों में फुटबॉल ही राज करता था, लेकिन कॉरपोरेट सपोर्ट, सुविधाओं और राज्य-स्तरीय मार्केटिंग की कमी ने इस खेल को बुरी तरह पीछे धकेल दिया.
मीडिया और विज्ञापन का खेल क्रिकेट के पाले में चला गया
1990 के दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के साथ प्राइवेट टीवी चैनल्स का बाजार खुला. सैटेलाइट टीवी के जरिए विदेशी क्रिकेट सीरीज का सीधा प्रसारण होने लगा. सचिन तेंदुलकर जैसे आइकन उभरे, जिन्होंने पूरी पीढ़ी को अपना दीवाना बना लिया. विज्ञापन जगत ने क्रिकेट को अपना सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म बनाया और करोड़ों के कॉन्ट्रैक्ट ने इस खेल को एक ग्लैमरस इंडस्ट्री में बदल दिया. वहीं फुटबॉल का प्रसारण बहुत सीमित था. जब तक इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) आया, तब तक क्रिकेट भारतीयों के लिए खेल नहीं, एक रोजमर्रा की जिंदगी का त्योहार बन चुका था. हालांकि अब तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है.
11 जून से शुरू हो रहे इस फीफा वर्ल्ड कप का सीधा प्रसारण भारत में भी होगा. अब भारत में इंग्लिश प्रीमियर लीग और ला लीगा देखने वालों की तादाद तेजी से बढ़ रही है. मगर अभी भी यह संख्या क्रिकेट मैचों के सामने बहुत छोटी है.
क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, सियासत और समाज का आईना
क्रिकेट ने भारतीय समाज को एक ऐसी चीज दी जिसकी हमें हमेशा तलाश रहती है- एक मुकम्मल नायक. क्रिकेट एक एलीट वर्ग का खेल होने के बावजूद भारत में इसने जाति, धर्म और क्षेत्रीय पहचानों से परे एक राष्ट्रीय जुनून का रूप ले लिया. फुटबॉल लंबे अर्से तक बंगाल, केरल, गोवा और पूर्वोत्तर राज्यों तक ही सिमटा रहा. उत्तर भारत के बड़े हिस्से में इसकी जगह या तो क्रिकेट ने ले ली या फिर कबड्डी और कुश्ती जैसे पारंपरिक खेल वहां ज्यादा लोकप्रिय रहे. इसके अलावा, भारतीय फुटबॉल टीम लंबे समय तक विश्व स्तर पर कोई बड़ी छाप नहीं छोड़ सकी. जब अपना देश विश्व स्तर पर खेलता ही नहीं दिखता, तो जुनून भी पनप नहीं पाता.
भारत में क्रिकेट और फुटबॉल के दीवाने कितने हैं?
ओरमैक्स मीडिया की इंडिया स्पोर्ट्स ऑडियंस रिपोर्ट 2024 के मुताबिक, भारत में लगभग 55 से 57 करोड़ लोग क्रिकेट को फॉलो करते हैं. इसमें टीवी पर मैच देखने वाले, स्टेडियम जाने वाले और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हाइलाइट्स या लाइव मैच देखने वाले सभी शामिल हैं. यह भारत की कुल आबादी का लगभग 40-42 प्रतिशत हिस्सा है. 'ग्रुपएम ईएसपी' की स्पोर्टिंग नेशन 2024 रिपोर्ट भी इसी तरह का आंकड़ा देती है और बताती है कि क्रिकेट भारत का अकेला ऐसा खेल है जिसके प्रशंसक हर उम्र, हर क्षेत्र और हर भाषा में फैले हैं.
इन्हीं रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में फुटबॉल को पसंद करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन अभी यह 7 से 8 करोड़ के बीच है. 'ओरमैक्स मीडिया' की 2024 की रिपोर्ट बताती है कि यह संख्या पिछले पांच सालों में लगभग दोगुनी हुई है, खासकर युवाओं और शहरी इलाकों में. इसमें इंग्लिश प्रीमियर लीग, ला लीगा, फीफा वर्ल्ड कप और ISL देखने वाले शामिल हैं. कुल आबादी के हिसाब से यह लगभग 5-6 प्रतिशत ही बैठता है.
क्रिकेट के प्रशंसकों में 'एक्टिव फैन' (जो नियमित रूप से मैच देखते हैं) की संख्या बहुत ज्यादा है, जबकि फुटबॉल में अभी भी बड़ा हिस्सा 'कैज़ुअल व्यूअर' (सिर्फ बड़े टूर्नामेंट देखने वाले) का है. ग्रामीण इलाकों में क्रिकेट की पहुंच लगभग हर घर तक है, जबकि फुटबॉल अभी भी शहरी और कुछ खास राज्यों (पश्चिम बंगाल, केरल, गोवा, पूर्वोत्तर) तक ही सिमटा हुआ है.
आखिर क्या बदल रहा है और क्या बदलेगा?
छोटे शहरों के युवा यूट्यूब पर मेसी-रोनाल्डो के गोल देखते हैं, तो फुटबॉल के लिए प्यार बढ़ता है. सुनील छेत्री, बाला देवी और संदेश झिंगन जैसे खिलाड़ियों ने नई पीढ़ी को सपना दिखाया है. ISL के जरिए फुटबॉल अब सिर्फ कोलकाता या गोवा का नहीं, बल्कि जमशेदपुर, मुंबई और बेंगलुरु का भी खेल बन गया है. मगर जिस तरह की दीवानगी किसी भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच के दौरान सड़कों पर दिखती है, उस तक फुटबॉल को पहुंचने में अभी कई दशक लग सकते हैं.


























