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AI की रफ्तार से बढ़ रहा पानी का संकट! UN की रिपोर्ट ने 2030 को लेकर बजाई खतरे की घंटी

Artificial Intelligence: AI आधारित डेटा सेंटरों की संख्या और क्षमता लगातार बढ़ रही है जिसके कारण पानी, ऊर्जा और भूमि की मांग भी तेजी से बढ़ेगी.

Artificial Intelligence: AI आधारित डेटा सेंटरों की संख्या और क्षमता लगातार बढ़ रही है जिसके कारण पानी, ऊर्जा और भूमि की मांग भी तेजी से बढ़ेगी.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने दुनिया भर में तकनीक की तस्वीर बदल दी है. स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योग और कारोबार जैसे कई क्षेत्रों में AI की मदद से काम पहले से कहीं अधिक तेज और आसान हुआ है. हालांकि, इस तकनीकी प्रगति की एक ऐसी कीमत भी सामने आ रही है जिस पर अब तक अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है. एक नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार AI का तेजी से बढ़ता विस्तार प्राकृतिक संसाधनों, खासकर पानी और बिजली पर भारी दबाव डाल सकता है.

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संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (United Nations University) की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि AI से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार आने वाले वर्षों में पर्यावरणीय चुनौतियों को और गंभीर बना सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, AI आधारित डेटा सेंटरों की संख्या और क्षमता लगातार बढ़ रही है जिसके कारण पानी, ऊर्जा और भूमि की मांग भी तेजी से बढ़ेगी.
संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (United Nations University) की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि AI से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार आने वाले वर्षों में पर्यावरणीय चुनौतियों को और गंभीर बना सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, AI आधारित डेटा सेंटरों की संख्या और क्षमता लगातार बढ़ रही है जिसके कारण पानी, ऊर्जा और भूमि की मांग भी तेजी से बढ़ेगी.
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विशेषज्ञों का अनुमान है कि दशक के अंत तक AI डेटा सेंटरों द्वारा इतनी मात्रा में पानी इस्तेमाल किया जा सकता है जिससे लगभग 1.3 अरब लोगों की घरेलू जरूरतें पूरी हो सकती हैं. यह संख्या लगभग पूरे अफ्रीका की आबादी के बराबर मानी जा रही है.
विशेषज्ञों का अनुमान है कि दशक के अंत तक AI डेटा सेंटरों द्वारा इतनी मात्रा में पानी इस्तेमाल किया जा सकता है जिससे लगभग 1.3 अरब लोगों की घरेलू जरूरतें पूरी हो सकती हैं. यह संख्या लगभग पूरे अफ्रीका की आबादी के बराबर मानी जा रही है.
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रिपोर्ट में कहा गया है कि डेटा सेंटरों के विस्तार के पीछे AI सबसे प्रमुख कारणों में शामिल है. वर्ष 2025 में डेटा सेंटरों की कुल बिजली खपत का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा केवल AI वर्कलोड से जुड़ा था. यदि वर्तमान रफ्तार जारी रहती है तो 2030 तक यह हिस्सा बढ़कर 40 प्रतिशत तक पहुंच सकता है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि डेटा सेंटरों के विस्तार के पीछे AI सबसे प्रमुख कारणों में शामिल है. वर्ष 2025 में डेटा सेंटरों की कुल बिजली खपत का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा केवल AI वर्कलोड से जुड़ा था. यदि वर्तमान रफ्तार जारी रहती है तो 2030 तक यह हिस्सा बढ़कर 40 प्रतिशत तक पहुंच सकता है.
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ऐसी स्थिति में AI से जुड़ी बिजली की मांग लगभग 378 टेरावॉट-घंटे (TWh) तक पहुंचने का अनुमान है. यह इतनी ऊर्जा है कि उप-सहारा अफ्रीका की पूरी आबादी की घरेलू बिजली जरूरतों को दो साल से अधिक समय तक पूरा किया जा सकता है.
ऐसी स्थिति में AI से जुड़ी बिजली की मांग लगभग 378 टेरावॉट-घंटे (TWh) तक पहुंचने का अनुमान है. यह इतनी ऊर्जा है कि उप-सहारा अफ्रीका की पूरी आबादी की घरेलू बिजली जरूरतों को दो साल से अधिक समय तक पूरा किया जा सकता है.
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अब तक AI के पर्यावरणीय प्रभावों पर चर्चा मुख्य रूप से कार्बन उत्सर्जन तक सीमित रही है. लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि पानी की खपत भी उतनी ही गंभीर समस्या बनती जा रही है. डेटा सेंटरों में मौजूद सर्वरों को लगातार ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है. इसके अलावा, AI सिस्टम को चलाने के लिए जिस बिजली का उत्पादन किया जाता है उसमें भी काफी पानी खर्च होता है. यही वजह है कि AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है.
अब तक AI के पर्यावरणीय प्रभावों पर चर्चा मुख्य रूप से कार्बन उत्सर्जन तक सीमित रही है. लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि पानी की खपत भी उतनी ही गंभीर समस्या बनती जा रही है. डेटा सेंटरों में मौजूद सर्वरों को लगातार ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत पड़ती है. इसके अलावा, AI सिस्टम को चलाने के लिए जिस बिजली का उत्पादन किया जाता है उसमें भी काफी पानी खर्च होता है. यही वजह है कि AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है.
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विशेषज्ञों के अनुसार, 2030 तक AI-केंद्रित डेटा सेंटरों को हर साल करीब 945 TWh बिजली की आवश्यकता हो सकती है. यह मात्रा पाकिस्तान, बांग्लादेश और नाइजीरिया की संयुक्त वार्षिक बिजली खपत से लगभग तीन गुना अधिक बताई जा रही है.
विशेषज्ञों के अनुसार, 2030 तक AI-केंद्रित डेटा सेंटरों को हर साल करीब 945 TWh बिजली की आवश्यकता हो सकती है. यह मात्रा पाकिस्तान, बांग्लादेश और नाइजीरिया की संयुक्त वार्षिक बिजली खपत से लगभग तीन गुना अधिक बताई जा रही है.
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AI का इस्तेमाल जितना बढ़ेगा, उतनी ही अधिक ऊर्जा की जरूरत होगी. खासतौर पर इमेज और वीडियो जनरेशन जैसे कार्य साधारण टेक्स्ट आधारित सवालों के मुकाबले कई गुना ज्यादा बिजली खर्च करते हैं.
AI का इस्तेमाल जितना बढ़ेगा, उतनी ही अधिक ऊर्जा की जरूरत होगी. खासतौर पर इमेज और वीडियो जनरेशन जैसे कार्य साधारण टेक्स्ट आधारित सवालों के मुकाबले कई गुना ज्यादा बिजली खर्च करते हैं.
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रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि AI का पर्यावरणीय प्रभाव केवल सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं है. इसके पीछे विशाल डेटा सेंटर, विशेष चिप्स, कूलिंग सिस्टम और ऊर्जा नेटवर्क जैसी कई संरचनाएं काम करती हैं जो प्राकृतिक संसाधनों का लगातार इस्तेमाल करती हैं.
रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि AI का पर्यावरणीय प्रभाव केवल सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं है. इसके पीछे विशाल डेटा सेंटर, विशेष चिप्स, कूलिंग सिस्टम और ऊर्जा नेटवर्क जैसी कई संरचनाएं काम करती हैं जो प्राकृतिक संसाधनों का लगातार इस्तेमाल करती हैं.
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शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि भविष्य की तकनीकी रणनीतियों में पर्यावरणीय प्रभावों को शामिल नहीं किया गया, तो AI का विस्तार जल और ऊर्जा संकट को और गहरा कर सकता है. इसी कारण रिपोर्ट में नीति निर्माताओं और टेक कंपनियों से अपील की गई है कि वे नवाचार के साथ-साथ पर्यावरणीय संतुलन को भी प्राथमिकता दें.
शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि भविष्य की तकनीकी रणनीतियों में पर्यावरणीय प्रभावों को शामिल नहीं किया गया, तो AI का विस्तार जल और ऊर्जा संकट को और गहरा कर सकता है. इसी कारण रिपोर्ट में नीति निर्माताओं और टेक कंपनियों से अपील की गई है कि वे नवाचार के साथ-साथ पर्यावरणीय संतुलन को भी प्राथमिकता दें.

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