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AI चैटबॉट का ज्यादा इस्तेमाल कमजोर कर सकता है आपका दिमाग! स्टडी में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

एबीपी टेक डेस्क   |  05 Apr 2026 07:02 AM (IST)
AI चैटबॉट का ज्यादा इस्तेमाल कमजोर कर सकता है आपका दिमाग! स्टडी में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

अगर आप ChatGPT, Gemini, Claude या Grok जैसे AI चैटबॉट्स का बार-बार इस्तेमाल करते हैं तो यह सुविधा धीरे-धीरे आपके सोचने के तरीके और ज्ञान पर असर डाल सकती है. यह सिर्फ एक अंदाजा नहीं बल्कि Massachusetts Institute of Technology के शोधकर्ताओं की चेतावनी है जिन्होंने इस विषय पर गहराई से अध्ययन किया है.

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AI चैटबॉट्स के साथ बातचीत करते समय एक बात अक्सर देखने को मिलती है कि वे यूजर की बातों से सहमति जताने की कोशिश करते हैं. शुरुआत में यह व्यवहार काफी मददगार लगता है क्योंकि इससे काम जल्दी और आसान हो जाता है. लेकिन धीरे-धीरे यही आदत एक समस्या बन सकती है. जब कोई सिस्टम बार-बार आपकी राय को सही ठहराता है तो आप बिना जांचे-परखे उसी पर भरोसा करने लगते हैं.

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MIT की एक स्टडी में बताया गया है कि इस तरह की बातचीत एक फीडबैक लूप तैयार करती है. इसमें यूजर अपनी राय रखता है, AI उससे सहमत होता है और फिर यूजर उसी राय पर और ज्यादा विश्वास करने लगता है. समय के साथ यह प्रक्रिया गलत धारणाओं को भी मजबूत कर सकती है.

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शोधकर्ताओं ने इस व्यवहार को समझने के लिए एक खास मॉडल तैयार किया और हजारों बातचीत का विश्लेषण किया. इसमें पाया गया कि AI हर बार निष्पक्ष जवाब नहीं देता बल्कि कई बार वह यूजर की पहले से बनी सोच को ही दोहराता है. इससे यूजर की सोच सीमित होने लगती है और वह नए दृष्टिकोण अपनाने से बचता है.

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दिलचस्प बात यह है कि यह प्रभाव केवल आम लोगों पर ही नहीं बल्कि समझदार और तार्किक लोगों पर भी पड़ सकता है. यानी AI का असर धीरे-धीरे हर किसी की सोच को प्रभावित कर सकता है.

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MIT की दूसरी स्टडी इस बात पर ध्यान दिलाती है कि AI टूल्स पर बढ़ती निर्भरता इंसान की सीखने की क्षमता को कमजोर कर सकती है. जब हर सवाल का जवाब तुरंत मिल जाता है तो लोग खुद से सोचने या जानकारी खोजने की कोशिश कम करने लगते हैं. जैसे-जैसे AI और ज्यादा पर्सनलाइज्ड और स्मार्ट होता जाएगा लोग उस पर और ज्यादा निर्भर होते जाएंगे. इसका नतीजा यह हो सकता है कि आप खुद से सीखने, समझने और चीजों की जांच करने की आदत खोने लगें.

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लंबे समय में यह निर्भरता इंसानी ज्ञान को सीमित कर सकती है. लोग आपस मंत चर्चा कम करेंगे नए विचारों से दूर होते जाएंगे और उनकी सामान्य समझ भी प्रभावित हो सकती है. यानी सुविधा के चक्कर में हम अपनी सोचने-समझने की असली ताकत खो सकते हैं.

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