युद्ध का असर! पेट्रोल-गैस के बाद अब स्मार्टफोन भी होंगे महंगे, अब पसंदीदा गैजेट खरीदने के लिए देने होंगे इतने ज्यादा पैसे
दरअसल, सेमीकंडक्टर बनाने के लिए जरूरी कई अहम संसाधन मिडिल ईस्ट से आते हैं. भले ही वहां बड़ी चिप फैक्ट्रियां न हों, लेकिन कच्चे माल की सप्लाई इस क्षेत्र पर काफी निर्भर है. उदाहरण के तौर पर हीलियम गैस जो चिप निर्माण में कूलिंग और लेजर प्रोसेस के लिए जरूरी होती है उसकी बड़ी आपूर्ति इसी इलाके से होती है. अगर तनाव के कारण सप्लाई प्रभावित होती है तो इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ सकता है.
इसके अलावा ब्रोमीन जैसे केमिकल जो चिप पैकेजिंग में काम आते हैं और सफाई के लिए जरूरी सल्फ्यूरिक एसिड का बड़ा हिस्सा भी इसी क्षेत्र से जुड़ा हुआ है. ऐसे में अगर हालात बिगड़ते हैं तो इन जरूरी सामग्रियों की उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित हो सकती हैं.
ऊपर से कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने स्थिति को और मुश्किल बना दिया है. चिप बनाने वाली फैक्ट्रियों में भारी मात्रा में बिजली की जरूरत होती है और ऊर्जा महंगी होने से उत्पादन लागत भी बढ़ रही है. इसके साथ ही माल ढुलाई और बीमा खर्च भी बढ़ रहे हैं जिससे कुल लागत पर दबाव साफ नजर आ रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह तनाव लंबा खिंचता है तो चिप सप्लाई पर असर पड़ सकता है जिसका सीधा असर इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की कीमतों पर दिखेगा. यानी आने वाले समय में स्मार्टफोन, लैपटॉप और यहां तक कि कारें भी महंगी हो सकती हैं.
भारत के लिए यह स्थिति चुनौती और अवसर दोनों लेकर आई है. एक तरफ जहां बढ़ती लागत देश में उभर रही सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है वहीं दूसरी ओर यह आत्मनिर्भर बनने का मौका भी देती है. अब जरूरत सिर्फ चिप बनाने तक सीमित नहीं है बल्कि उनसे जुड़े कच्चे माल और केमिकल्स के घरेलू उत्पादन पर भी ध्यान देना होगा. दुनिया के किसी एक हिस्से में पैदा हुआ संकट अब सीधे हमारी जेब पर असर डाल सकता है और यही आज की ग्लोबल इकोनॉमी की सच्चाई भी है.