InPics: जब हिटलर भी हो गया था हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का मुरीद
हॉकी के इस महान खिलाड़ी का निधन तीन दिसम्बर 1979 को दिल्ली में हुआ था. उन्हें खेल जगत में उल्लेखनीय सेवाओं के लिए 1956 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. फोटो-गूगल फ्री इमेज
लेकिन ध्यानचंद इसके बावजूद बर्लिन के खिलाफ दनदन गोल मारने से पीछे नहीं हटे. इसके बाद हिटलर को मजबूर होकर ध्यानचंद का मुरीद होना पड़ा. यही वो वक्त था जब तानाशाह ने ध्यानचंद को 'हॉकी का जादूगर' कहा था. फोटो-गूगल फ्री इमेज
अपने हॉकी कैरियर में अंग्रेजों के खिलाफ 1000 से अधिक गोल दागने वाले मेजर ध्यानचंद ओलंपिक में बर्लिन के खिलाफ फाइनल मैच खेल रहे थे. वहां मौजूद जर्मनी के प्रमुख तानाशाह हिटलर ने ध्यानचंद की हॉकी बदलवा दी और दूसरे हॉकी स्टिक से खेलने के लिए कहा. फोटो-गूगल फ्री इमेज
हॉकी के मशहूर भारतीय खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की आज 113वीं जयंती है. इस दिन को भारत में खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस मौके पर देश और दुनिया में उन्हें याद किया जा रहा है. ऐसे में हम आपको बताने जा रहे हैं मेजर ध्यानचंद के जीवन का सबसे खास वो पल जब दुनिया के मशहूर तानाशाह हिटलर ने उन्हें 'हॉकी का जादूगर' करार दिया था. फोटो-गूगल फ्री इमेज
29 अगस्त, 1905 में इलाहाबाद में जन्में मेजर ध्यानचंद के जीवनकाल में कई ऐसे मौके आए जब उन्होंने देश को खुदपर नाज करने का मौका दिया. 1936 के बर्लिन ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम का नेतृत्व करने से पहले ध्यानचंद ने 1928 में एम्सटर्डम, 1932 में लॉस एंजेलिस में भी टीम की अगुवाई की थी. 1928 और 1932 के ओलंपिक में भी भारत ने स्वर्ण पदक अपने नाम किया था. फोटो-गूगल फ्री इमेज
हालांकि कहा ये भी जाता है कि ध्यानचंद के खेल से प्रभावित होकर हिटलर ने उन्हें अपनी सेना में उच्च पद पर आसीन होने की पेशकश की थी. लेकिन ध्यानचंद ने इसे ठुकरा दिया था. फोटो-गूगल फ्री इमेज
बताया जाता है कि ध्यानचंद हॉकी इतने बेहतरीन खिलाड़ी थे कि दुनिया को उनकी हॉकी स्टिक पर शक होने लगा था. शक वो भी इस हद तक की उनकी स्टिक को चेक किया गया कि कहीं उसमें स्टील इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा है या उसमें किसी प्रकार का गोंद तो नहीं लगाया गया है. फोटो-गूगल फ्री इमेज
दरअसल, साल 1936 में दुनिया की सबसे मजबूत बर्लिन की टीम को ध्यानचंद की अगुवाई वाली भारतीय हॉकी टीम ने 8-1 से ओलम्पिक में हराकर सबको चौंका दिया था. यही वो वक्त था जब हिटलर को ध्यानचंद का मुरीद होना पड़ा था. फोटो-गूगल फ्री इमेज