Valley Of Flowers: पर्यटकों के लिए खुली फूलों की घाटी, जानें ट्रेकिंग का सही समय और जरूरी बातें

उत्तराखंड का प्रसिद्ध वैली ऑफ फ्लावर्स नेशनल पार्क 1 जून 2026 से पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है. बर्फ की मोटी चादर से कई महीनों तक ढका रहने वाला यह इलाका अब एक बार फिर ट्रेकर्स, फोटोग्राफर्स और प्रकृति प्रेमियों का स्वागत कर रहा है.
गढ़वाल हिमालय के चमोली जिले में स्थित यह खूबसूरत घाटी मानसून के आते ही रंग-बिरंगे फूलों से सज जाती है. करीब 87 वर्ग किलोमीटर में फैली यह घाटी 3,600 मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित है और नंदा देवी बायोस्फीयर रिजर्व का हिस्सा मानी जाती है.
वैली ऑफ फ्लावर्स की सबसे बड़ी खासियत यहां हर साल होने वाला दुर्लभ फूलों का खिलना है. बारिश शुरू होते ही पूरी घाटी गुलाबी, बैंगनी, नीले, सफेद और पीले फूलों से भर जाती है. यहां हिमालयन ब्लू पॉपी, ब्रह्म कमल, कोबरा लिली और कई औषधीय पौधों की प्रजातियां भी देखने को मिलती हैं.
अगर घूमने का सही समय चुनना चाहते हैं तो अगस्त सबसे बेहतरीन महीना माना जाता है. जून में बर्फ पिघलने के बाद हरियाली नजर आती है, जुलाई में फूल खिलने शुरू होते हैं और अगस्त तक घाटी अपने सबसे खूबसूरत रूप में दिखाई देती है. सितंबर में फूल कम होने लगते हैं, लेकिन पहाड़ों के शानदार नजारे देखने को मिलते हैं.
यह घाटी सिर्फ फूलों के लिए ही नहीं, बल्कि दुर्लभ वन्यजीवों के लिए भी जानी जाती है. यहां रेड फॉक्स, ब्लू शीप, हिमालयन मस्क डियर और कभी-कभी दुर्लभ स्नो लेपर्ड भी देखा जा सकता है. हालांकि इन जानवरों को देख पाना आसान नहीं होता.
यहां आने वाले पर्यटकों को किसी लग्जरी ट्रिप की नहीं, बल्कि प्रकृति के बेहद करीब रहने का अनुभव मिलता है. फूलों से भरे मैदान, साफ बहती जलधाराएं और हिमालय की शांति इस जगह को खास बनाती है. दिलचस्प बात यह है कि 1931 में ब्रिटिश पर्वतारोही ने इस घाटी को दुनिया के सामने पहचान दिलाई थी.
ट्रेक की बात करें तो इसे मध्यम कठिनाई वाला माना जाता है. यात्रा गोविंदघाट के पास स्थित पुलना गांव से शुरू होती है. यहां से करीब 9 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर घांघरिया पहुंचना होता है और फिर अगले दिन 4 किलोमीटर का ट्रेक वैली ऑफ फ्लावर्स तक ले जाता है. पूरा सफर आमतौर पर 3 से 4 दिनों में पूरा हो जाता है.
यात्रा पर जाने से पहले कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए. घाटी में प्रवेश के लिए परमिट लेना अनिवार्य है और यहां रात में रुकने या कैंपिंग की अनुमति नहीं है. ट्रेकर्स को शाम 5 बजे तक घांघरिया लौटना होता है. मानसून के दौरान रास्ते फिसलन भरे हो सकते हैं, इसलिए मजबूत जूते और ट्रेकिंग पोल साथ रखना बेहतर रहेगा.