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Mahabharata: क्यों देवी गंगा ने अपने सभी पुत्रों को नदी में प्रवाहित किया और कैसे जन्मे भीष्म पितामह

अणिमा शुक्ला   |  24 May 2026 04:43 PM (IST)
Mahabharata: क्यों देवी गंगा ने अपने सभी पुत्रों को नदी में प्रवाहित किया और कैसे जन्मे भीष्म पितामह

भीष्म पितामह की जन्म गाथा

1

हस्तिनापुर के राजा शांतनु एक दिन गंगा नदी के तट पर घूम रहे थे. तभी उन्होंने एक अद्भुत रूपवती स्त्री को देखा, जो स्वयं माँ गंगा थीं. उनके दिव्य सौंदर्य को देखकर राजा मोहित हो गए और विवाह का प्रस्ताव रखा. गंगा ने एक शर्त रखी कि राजा कभी भी उनके किसी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेंगे. राजा ने यह वचन स्वीकार कर लिया.

2

विवाह के बाद गंगा को एक-एक करके सात पुत्र हुए, लेकिन हर पुत्र के जन्म के बाद वह उसे गंगा नदी में प्रवाहित कर देती थीं. राजा शांतनु अपने वचन के कारण मौन रहे, पर उनके मन में गहरा दुःख था. पूरे राज्य में यह रहस्य चर्चा का विषय बन गया कि आखिर रानी ऐसा क्यों कर रही हैं.

3

जब आठवें पुत्र का जन्म हुआ, तब राजा शांतनु अपने आप को रोक नहीं सके. जैसे ही गंगा उस बालक को लेकर नदी की ओर बढ़ीं, शांतनु ने उन्हें रोक लिया और पूछा कि आखिर वह अपने ही बच्चों के साथ ऐसा क्यों करती हैं. राजा के यह शब्द कहते ही गंगा मुस्कुराईं और बोलीं कि आज उनकी प्रतिज्ञा टूट चुकी है. तब उन्होंने शांतनु को सात वसुओं के श्राप का पूरा रहस्य बताया. गंगा ने कहा कि यह आठवां पुत्र जीवित रहेगा और भविष्य में महान योद्धा बनेगा. यही बालक आगे चलकर देवव्रत कहलाया.

4

देवी गंगा द्वारा अपने पुत्रों को नदी में बहाने के पीछे एक गहरा रहस्य छिपा था. वास्तव में वे सभी आठ वसु थे, जिन्हें महर्षि वशिष्ठ के श्राप के कारण मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ा था. गंगा ने उन्हें वचन दिया था कि वह जन्म लेते ही उन्हें इस संसार के बंधन से मुक्त कर देंगी. इसलिए उन्होंने सातों पुत्रों को जन्म के तुरंत बाद गंगा में प्रवाहित कर दिया.

5

गंगा अपने आठवें पुत्र देवव्रत को अपने साथ ले गईं. उन्होंने उसे महान ऋषियों और गुरुओं के आश्रम में शिक्षित किया. देवव्रत ने वेद, शास्त्र, राजनीति और युद्धकला में अद्भुत ज्ञान प्राप्त किया. भगवान परशुराम जैसे महान गुरु से उन्होंने धनुर्विद्या सीखी. धीरे-धीरे देवव्रत एक तेजस्वी और पराक्रमी राजकुमार बने.

6

कुछ वर्षों बाद माँ गंगा देवव्रत को लेकर हस्तिनापुर पहुँचीं. उन्होंने राजा शांतनु को उनका पुत्र सौंप दिया. देवव्रत की वीरता, ज्ञान और विनम्रता देखकर पूरा राज्य प्रसन्न हो उठा. राजा शांतनु को अपने पुत्र पर अत्यंत गर्व हुआ. देवव्रत ने कम उम्र में ही अपनी बुद्धिमानी और शौर्य से सभी का दिल जीत लिया.

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