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जन्म के बाद नवजात में इस वजह से होने लगती है इंटर्नल ब्लीडिंग, Vitamin K इंजेक्शन से बच सकती है जान

कविता गाडरी   |  09 May 2026 12:23 PM (IST)
जन्म के बाद नवजात में इस वजह से होने लगती है इंटर्नल ब्लीडिंग, Vitamin K इंजेक्शन से बच सकती है जान

Vitamin K Injection: अमेरिका में नवजात बच्चों के जन्म के तुरंत बाद दिए जाने वाले विटामिन के इंजेक्शन को लेकर डॉक्टर ने गंभीर चिंता जताई है. हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां माता-पिता की ओर से यह इंजेक्शन लगवाने से इनकार करने के बाद नवजात बच्चों में खतरनाक इंटरनल ब्लीडिंग यानी शरीर के अंदर ब्लीडिंग की समस्या देखी गई. कुछ मामलों में बच्चों की मौत तक हो गई.

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डॉक्टर के अनुसार, यह समस्या 'विटामिन K' डिफिशिएंसी ब्लीडिंग नाम की एक दुर्लभ लेकिन बहुत खतरनाक स्थिति की वजह से होती है. यह तब होता है जब नवजात के शरीर में विटामिन के की कमी के कारण खून सही तरीके से जम नहीं पाता. ऐसे में शरीर के अंदर अचानक ब्लीडिंग शुरू हो सकती है जो कई बार जानलेवा साबित होती है.

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हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के मैरीलैंड में 7 हफ्ते के एक बच्चे को दौरे पड़ने लगे. इस तरह के कई और मामले सामने आएं. वहीं इन सभी मामलों में एक बात समान यह थी कि बच्चों को जन्म के बाद 'विटामिन के' का इंजेक्शन नहीं लगाया गया था.

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'विटामिन के' शरीर में इसे क्लॉटिंग फैक्टर्स बनाने में मदद करता है जो खून बहाने को रोकते हैं. लेकिन जन्म के समय बच्चों के शरीर में विटामिन के का स्तर बहुत कम होता है. क्योंकि गर्भावस्था के दौरान मां से बच्चे तक इसकी बहुत कम मात्रा पहुंच पाती है.

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इसके अलावा मां के दूध में भी विटामिन के की मात्रा बहुत कम होती है. यही वजह है की जन्म के बाद शुरुआती कुछ हफ्तों और महीनाें में नवजात बच्चों में खून बहने का खतरा ज्यादा रहता है.

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डॉक्टर का कहना है कि नवजात बच्चों के शरीर में क्लॉटिंग फैक्टर सीमित मात्रा में होते हैं और वह जल्दी खत्म हो जाते हैं. विटामिन के इंजेक्शन शरीर को नए क्लॉटिंग फैक्टर बनाने में मदद करता है और गंभीर ब्लीडिंग के खतरे को कम करता है.

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एक्सपर्ट के अनुसार जिन बच्चों को जन्म की बाद विटामिन के का इंजेक्शन नहीं दिया जाता, उनमें वीकेडीबी होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. ऐसे बच्चों में दिमाग और आंतों या शरीर के दूसरे अंगों में ब्लीडिंग हो सकती है.

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इस बीमारी के लक्षणों में बिना वजह शरीर पर नीले निशान पड़ना, खून की उल्टी होना, मल में खून आना, दौरा पड़ना, सुस्ती, स्किन पीली पड़ना या अचानक बेहोश होना शामिल है. कई मामलों में शुरुआत में कोई लक्षण दिखाई भी नहीं देते और अचानक गंभीर ब्लीडिंग शुरू हो जाती है.

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डॉक्टरों के अनुसार विटामिन के इंजेक्शन न लेने वाले बच्चों में जीवन के पहले 6 महीनों के दौरान वीकेडीबी होने का खतरा करीब 1 प्रतिशत तक बढ़ जाता है.

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वहीं डॉक्टर के अनुसार वीकेडीबी को तीन चरणों में बांटा गया है. पहले अर्लियर वीकेडीबी है, जो जन्म के 24 घंटे के अंदर हो सकता है. यह अक्सर प्रेगनेंसी के दौरान मां की ओर से ली गई दवाओं से जुड़ा होता है. वहीं दूसरा क्लासिकल वीकेडीबी है जो जन्म के दूसरे से सातवें दिन के बीच दिखाई देता है. इसमें नाभि, स्किन, पेट या सर्जरी वाली जगह से खून बह सकता है. सबसे खतरनाक लेट वीकेडीबी है जो जन्म के दो हफ्तों से लेकर 6 महीनों के बीच कभी भी हो सकता है.

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डॉक्टरों के अनुसार इस स्थिति में करीब 30 से 60 प्रतिशत बच्चों में दिमाग के अंदर ब्लीडिंग होने का खतरा रहता है. इससे बच्चों को दौरे पड़ सकते हैं, उल्टी हो सकती है, ज्यादा नींद आ सकती है या उसकी जान भी जा सकती है.

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वहीं भारत में ज्यादातर अस्पताल और वर्किंग सेंटर में नवजात बच्चों को विटामिन के इंजेक्शन देना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है. स्वास्थ्य मंत्रालय भी सभी नवजात बच्चों को जन्म के बाद प्रोफिलैक्टिक विटामिन के वन देने की सिफारिश करता है.

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आमतौर पर 1000 ग्राम से ज्यादा वजन वाले बच्चों को 1 मिलीग्राम का इंजेक्शन दिया जाता है. जबकि कम वजन वाले बच्चों को 0.5 मिलीग्राम की डोज दी जाती है. यह इंजेक्शन जन्म के पहले 6 घंटे के अंदर और अधिकतम 24 घंटे के अंदर लगाया जाता है.

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