सिर्फ शराब पीने से ही फैटी नहीं होता लिवर, ये पांच वजह भी बढ़ा देती हैं खतरा
फैटी लिवर को मेडिकल टर्म में हेपेटिक स्टीटोसिस कहा जाता है. यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें लिवर की कोशिकाओं में सामान्य से अधिक फैट (खासकर ट्राइग्लिसराइड्स) जमा हो जाता है. यह दो तरह अल्कोहलिक फैटी लिवर और नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर का होता है.
ज्यादा शराब पीने वालों को अल्कोहलिक फैटी लिवर की दिक्कत होती है, जबकि नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर रोग उन लोगों को होता है, जो शराब का सेवन नहीं या बेहद कम करते हैं.
कई रिसर्च के मुताबिक, भारत में NAFLD की दिक्कत तेजी से बढ़ रही है. अनुमान लगाया जा रहा है कि अगले 10 से 20 साल तक यह दिक्कत मौत की मुख्य वजह बन सकती है.
फैटी लिवर की सबसे आम वजह मोटापा है. दरअसल, जिन लोगों का बॉडी मास इंडेक्स (BMI) 30 से ज्यादा होता है. उनमें NAFLD डिवेलप होने के आसार काफी ज्यादा होते हैं. मोटापा न केवल लिवर में फैट जमा करता है, बल्कि इंसुलिन रेसिस्टेंट भी बढ़ाता है. इससे NAFLD ज्यादा गंभीर हो सकता है.
टाइप-2 डायबिटीज और इंसुलिन रेसिस्टेंट का सीधा कनेक्शन फैटी लिवर से है. जब शरीर में इंसुलिन का इस्तेमाल ठीक से नहीं होता है, तब लिवर में फैट काफी ज्यादा बढ़ जाता है. कई रिसर्च बताती हैं कि डायबिटीज से पीड़ित लोगों में NAFLD का खतरा 50-80% तक ज्यादा होता है.
अनहेल्दी लाइफस्टाइल में जंक फूड, तले-भुने खाद्य पदार्थ और फ्रुक्टोज युक्त पेय पदार्थों का ज्यादा सेवन करना भी फैटी लिवर का बड़ा कारण बन रहा है. रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स जैसे सफेद ब्रेड, सफेद चावल और मैदा के अलावा ट्रांस फैट और चीनी युक्त खाद्य पदार्थ लिवर में फैट बढ़ाते हैं.
हाई कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड लेवल भी फैटी लिवर के प्रमुख कारण हैं. ब्लड में ट्राइग्लिसराइड का बढ़ा हुआ लेवल लिवर में फैट बढ़ाता है. हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल और इंसुलिन रेसिस्टेंस की वजह से NAFLD का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है.
कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स और टैमोक्सीफेन दवाओं के कारण भी लिवर में फैट बढ़ सकता है. इसके अलावा कुछ मेडिकल कंडीशन जैसे पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS), हेपेटाइटिस सी और जेनेटिक डिसऑर्डर जैसे हाइपोबेटालिपोप्रोटीनेमिया भी फैटी लिवर का खतरा बढ़ाते हैं.