World Sparrow Day: शहरों में नजर क्यों नहीं आती हैं गौरैया, सिर्फ गांवों से ही क्यों रह गया कनेक्शन?

World Sparrow Day: गौरेया एक ऐसी चिड़िया है, जिसे हम पहले अक्सर घर-आंगन में फुदकते हुए देखा करते थे. जब भी हम उनको खाना-पानी देते थे तो वो अक्सर हमारे घरों में आती थीं, अपना घोंसला बनाती थीं और फिर उसमें उनके छोटे-छोटे बच्चे होते थे. लेकिन अब शहर कंक्रीट के जंगल बनते जा रहे हैं, जिससे पेड़ खत्म हो रहे हैं और गौरेया भी शहरों में नजर नहीं आ रही हैं. लेकिन गांवों से अभी तक उनका आशियाना हटा नहीं है. चलिए जानें कि आखिर ऐसा क्यों है.
दुनियाभर में 20 मार्च को वर्ल्ड स्पैरो डे मनाया जाता है. हाउस स्पैरो गौरेया की सबसे सामान्य प्रजाति मानी जाती है.
पहले तो लोग घरों में बालकनी में, छत पर इस चिड़िया को बैठे हुए देखते थे, लेकिन अब ये शहरों से बिल्कुल गायब सी हो चुकी हैं. यहां ये बहुत कम ही नजर आती हैं.
जैसे-जैसे शहर बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे बिल्डिंग बन रही हैं और लोग अपने घरों में गौरेया को घोंसला बनाने के लिए जगह नहीं दे रहे हैं. पेड़ भी कम होते जा रहे हैं.
ऐसे में हरियाली खत्म होने के कारण गौरेया का जीवन भी शहरों से खत्म होता जा रहा है. जहां पर भी ज्यादा हरियाली देखने को मिलेगी, गौरेया का बसेरा वहां पर होगा.
हालांकि शहरों में कुछ लोग आज भी कृत्रिम घोंसले बनाकर या फिर बर्ड हाउस बनाकर गौरेया को घोंसले बनाने की जगह दे देते हैं.
हालांकि गांव अभी भी गौरेया के पनाहगाह बने हुए हैं. यहां वो आराम से अपने घोंसले बनाती हैं और हरियाली की कमी नहीं है, इसलिए खाने की भी कमी नहीं है.
गांवों में भीड़ और शोरगुल काफी कम है. इसलिए वहां सहज ही घर की देहरी पर गौरेया मंडराती हुई नजर आ जाती हैं.
गांवों में लोग बचा हुआ खाना डस्टबिन में डालने की बजाए मुंडेरों पर चिड़िया के लिए रख देते हैं, इसलिए वो वहां आती हैं और उनको आसानी से भोजन मिल जाता है.