S या J आकार में ही समुद्र के नीचे क्यों बिछाई जाती हैं तेल-गैस की पाइपलाइन, गजब है इसके पीछे का विज्ञान

ऊर्जा की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए भारत अब जमीन के साथ-साथ समंदर के नीचे भी अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है. यूएई के साथ सीधी समुद्री पाइपलाइन बनाने की योजना इसी दिशा में एक बड़ा कदम है, ताकि होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे तनावपूर्ण रास्तों पर निर्भरता कम हो सके. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हजारों फीट गहरे पानी में पाइपलाइन बिछाना कैसे संभव होता है? यह प्रक्रिया केवल पाइप बिछाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे 'S' और 'J' आकार का गजब का विज्ञान काम करता है. इंजीनियरिंग के इस अद्भुत प्रदर्शन में पाइपों को सीधा बिछाने के बजाय विशेष तकनीकों के जरिए एक निश्चित घुमाव दिया जाता है, जो उनकी मजबूती और सुरक्षा के लिए अनिवार्य है.
समुद्र के नीचे पाइपलाइन बिछाने के लिए 'S-Lay' सबसे प्रचलित और पुरानी तकनीक है. इसका उपयोग मुख्य रूप से कम और मध्यम गहराई वाले पानी में किया जाता है. इस प्रक्रिया में, एक विशेष जहाज पर पाइप के टुकड़ों को आपस में वेल्डिंग के जरिए जोड़ा जाता है.
जैसे-जैसे जहाज आगे बढ़ता है, पाइप लाइन जहाज के पिछले हिस्से से समंदर में उतरती है. इस दौरान पाइप हवा में एक कर्व बनाता है और समुद्र तल पर जाकर टिक जाता है. जहाज से लेकर समंदर के फर्श तक का यह सफर पाइप को अंग्रेजी के 'S' अक्षर जैसा आकार देता है. यह आकार पाइप को झुकने या टूटने से बचाने के लिए जरूरी तनाव प्रदान करता है.
जब पाइपलाइन को बहुत अधिक गहराई (3,500 मीटर तक) में बिछाना होता है, तो S-Lay तकनीक नाकाम हो जाती है, क्योंकि पाइप पर पड़ने वाला दबाव उसे मोड़ सकता है. यहां 'J-Lay' तकनीक काम आती है.
इस पद्धति में पाइप को जहाज पर वर्टिकल खड़ा करके जोड़ा जाता है. पाइप सीधा पानी में नीचे उतरता है और केवल समुद्र तल के करीब पहुंचने पर ही मुड़ता है, जिससे यह 'J' का आकार ले लेता है. इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि पाइप पर पड़ने वाला यांत्रिक दबाव बहुत कम हो जाता है, जिससे अत्यधिक गहरे पानी में भी रिसाव या क्षति का खतरा नहीं रहता है.
समंदर के अंदर काम शुरू करने से पहले सबसे महत्वपूर्ण चरण 'सर्वेक्षण' होता है. इसके लिए पानी के नीचे चलने वाले अत्याधुनिक रोबोट्स का इस्तेमाल किया जाता है. ये रोबोट समुद्र तल का बारीकी से निरीक्षण करते हैं, ताकि यह पता लगाया जा सके कि रास्ता समतल है या नहीं.
पाइपलाइन बिछाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि रास्ता समुद्री पहाड़ों, ज्वालामुखियों या संवेदनशील समुद्री जीव-जंतुओं के क्षेत्रों से होकर न गुजरे. एक सुरक्षित रूट का चयन ही इस अरबों डॉलर के प्रोजेक्ट की सफलता सुनिश्चित करता है.
समुद्र का खारा पानी लोहे और स्टील का सबसे बड़ा दुश्मन होता है. पाइपलाइन को दशकों तक सुरक्षित रखने के लिए उन पर कंक्रीट या विशेष प्लास्टिक की कोटिंग की जाती है. इसके अलावा, पाइपों को जंग से बचाने के लिए 'कैथोडिक प्रोटेक्शन' तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. कई जगहों पर पाइपलाइन को केवल तल पर नहीं छोड़ा जाता, बल्कि 'जेट स्लेज' नामक मशीन के जरिए समुद्र तल की मिट्टी हटाकर उसे जमीन के अंदर धकेल दिया जाता है.
यह कोटिंग और सुरक्षा कवच पाइपलाइन को समुद्री लहरों और रासायनिक प्रतिक्रियाओं से बचाकर रखते हैं. हजारों फीट नीचे पानी का दबाव इतना अधिक होता है कि वह सामान्य धातु को पिचक सकता है. इस भारी दबाव को झेलने के लिए पाइपलाइनों के निर्माण में केवल उच्च गुणवत्ता वाले विशेष स्टील का ही उपयोग किया जाता है.
पाइप की मोटाई और उसकी बनावट को वैज्ञानिक रूप से इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वह बाहरी दबाव और अंदर से बहने वाले तेल या गैस के प्रेशर को संतुलित कर सके. इंजीनियरिंग की यह सटीकता ही सुनिश्चित करती है कि गहरे समंदर में भी ऊर्जा का प्रवाह बिना किसी बाधा के जारी रहे.