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ईरान को परमाणु बम क्यों नहीं बनाने देना चाहता इजरायल, आखिर क्या है उसके डर की वजह?

कविता गाडरी   |  12 Apr 2026 09:18 AM (IST)
ईरान को परमाणु बम क्यों नहीं बनाने देना चाहता इजरायल, आखिर क्या है उसके डर की वजह?

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच इजरायल और ईरान के बीच टकराव अब पहले की तरह युद्ध तक सीमित नहीं रहा है. बल्कि यह परमाणु हथियारों के खतरे तक पहुंच गया है. हाल के महीना में अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर इजरायल ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु शक्ति बनने से क्यों रोकना चाहता है.

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दरअसल इजरायल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता रहा है. इजरायल का साफ मानना है कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल कर लेता है, तो क्षेत्र में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है. यही वजह है कि इजरायल ने बार-बार यह संकेत दिया है कि वह ईरान को परमाणु क्षमता हासिल करने से रोकने के लिए सैन्य कार्रवाई तक करने को तैयार है.

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वहीं कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला हमले करने का एक बड़ा खतरा यह भी है कि इससे ईरान के अंदर परमाणु हथियार बनाने की इच्छा और मजबूत हो सकती है.

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अब तक ईरान ने आधिकारिक तौर पर परमाणु हथियार बनाने की बात नहीं मानी, लेकिन लगातार बढ़ते हमलों और दबाव के बीच वहां के सख्त रुख वाले गुट इसे सुरक्षा के लिए जरूरी कदम के रूप में देख सकते हैं.

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इजरायल ने साफ कर दिया है ईरान का परमाणु हथियार बनाना उसकी रेड लाइन है. ऐसे में स्थिति बहुत नाजुक बनी हुई है. अगर ईरान इस दिशा में आगे बढ़ता है तो और बड़े पैमाने पर युद्ध हो सकता है, यही कारण है कि इन दोनों देशों के बीच लगातार तनाव की स्थिति बनी हुई है.

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वहीं माना जा रहा है कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल कर लेता है तो इसका असर सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा. सऊदी अरब भी पहले ही संकेत दे चुका है कि ईरान के परमाणु शक्ति बनने पर वह भी ऐसा कदम उठा सकता है. इसके अलावा तुर्की और मिस्र जैसे देश भी इस दौड़ में शामिल हो सकते हैं. इससे पूरे पश्चिम एशिया में परमाणु हथियार की होड़ शुरू होने का खतरा बढ़ जाएगा.

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वहीं 2015 में हुआ परमाणु समझौता जिससे JCPOA के नाम से जाना जाता है, कभी खतरे को कंट्रोल करने की कोशिश था. इस समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कई सीमाएं स्वीकार की थी. लेकिन 2018 में अमेरिका के इससे बाहर होने के बाद हालात फिर बिगड़ने लगे. इसके बाद ईरान ने यूरेनियम संवर्धन बढ़ाया और अंतरराष्ट्रीय निगरानी भी सीमित कर दी.

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